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Kanpur Dehat PWD Scam: कानपुर देहात जिले में लोक निर्माण विभाग (PWD) में टेडर प्रक्रिया पूरी होने से पहले 56 लाख रुपए का भुगतान का आरोप लगा है। ठेकेदारों ने कैशियर और अकाउंटेंट पर 10% कमीशन मांगने की शिकायत भी की है।
कानपुर देहात पीडब्ल्यूडी में भुगतान को लेकर विवाद
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आरोप है कि कानपुर देहात के लोक निर्माण विभाग में जिला मार्गों के उच्चीकरण के लिए 56 लाख रुपए की राशि स्वीकृत की गई थी जो टेडर प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही धनराशि जारी कर दी गई।
टेंडर से पहले 56 लाख का भुगतान
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पब्लिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी के अनुसार नवंबर महीने में बुधौली-रसधान-डेरापुर मार्ग के चौड़ीकरण और उच्चीकरण के लिए एकमुश्त व्यवस्था के तहत कुल 5 करोड़ 83 लाख 7 हजार रुपए की परियोजना स्वीकृत की गई थी। इस परियोजना के लिए टेडर की विज्ञप्ति जारी की गई। लेकिन प्रक्रिया पूरी होने से पहले 56 लाख रुपए की राशि का भुगतान कर दिया गया। ये भुगतान किन वजहों से किया गया है इसे लेकर विभाग की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है।
नियमों के खिलाफ बताया जा रहा भुगतान
शासन के दिशा-निर्देशों के अनुसार परियोजना में भुगतान कार्य के प्रगति के आधार पर किया जाता है। यूटिलिटी शिफ्टिंग (Utility Shifting) जैसे कार्यों के लिए भी टेंडर खुलने से पहले भुगतान का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में टेंडर से पूर्व धनराशि जारी किया जाना नियमों के विपरीत माना जा रहा है और इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता के रूप में देखा जा रहा है।
ठेकेदारों ने लगाए कमीशन मांगने के आरोप
मामला उस वक्त सामने आया जब PWD विभाग के कुछ ठेकेदारों द्वारा अधिकारियों को पत्र भेजने का पता चला। पत्र में आरोप लगाया गया कि विभाग में तैनात कैशियर और अकाउंटेंट प्रत्येक बिल के भुगतान पर 10 प्रतिशत कमीशन की मांग कर रहे है। ठेकेदारों का कहना है कि कमीशन मिलने के बाद ही भुगतान की फाइल आगे बढ़ाई जाती है। इन आरोपों से विभाग की साख पर सवाल उठने लगे हैं।
अधिकारियों के बयान भी आए सामने
इस प्रकरण पर प्रतिक्रिया देते हुए अधिशासी अभियंता सुनील कुमार ने बताया कि उन्हें शिकायत की जानकारी मिली है और मामले को अग्रिम कार्रवाई के लिए उच्चाधिकारियों को भेज दिया गया है। वहीं, मुख्य अभियंता ने इस तरह की किसी भी अनियमितता की जानकारी होने से इनकार किया है।
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जीरो टॉलरेंस नीति पर टिकी निगाहें
पूरा मामला सामने आने के बाद विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल उठ रहे हैं। अब निगाहें जिला प्रशासन और शासन स्तर पर होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं, खासकर मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस नीति के तहत इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर क्या कदम उठाए जाते हैं।
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