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Ghaziabad Triple Suicide: गाजियाबाद की तीन बहनों की आत्महत्या सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि भारत में बढ़ते डिजिटल संकट की सबसे भयावह तस्वीर है। यह घटना साफ बताती है कि हाई-डोपामिन ऑनलाइन गेम, अनियंत्रित स्क्रीन टाइम और डिजिटल दुनिया का दबाव आज बच्चों और किशोरों की मानसिकता को गहराई से चोट पहुंचा रहा है। बच्चे मोबाइल के अंदर चलने वाली कृत्रिम उत्तेजनाओं, पुरस्कार आधारित गेमिंग और एल्गोरिथ्म द्वारा नियंत्रित व्यवहार में इतने उलझ जाते हैं कि वास्तविक जीवन, पढ़ाई, परिवार और भावनात्मक संतुलन सब पीछे छूट जाता है। जब माता-पिता सीमाएं लगाने की कोशिश करते हैं, तो बच्चों में तनाव, चिड़चिड़ापन, बेचैनी और कई बार अत्यधिक नकारात्मक फैसले सामने आते हैं।
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डिजिटल खतरों से बचाव के लिए सरकार बनाए नीति
डिजिटल लत अब किसी शौक या आदत का नाम नहीं है, बल्कि एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य चुनौती है जिसे राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकारना आवश्यक है। सरकार को तुरंत ऐसी नीति बनानी चाहिए जो ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और बच्चों को लक्षित डिजिटल खतरों को नियंत्रित कर सके। ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों के लिए लाइसेंसिंग प्रक्रिया अनिवार्य हो ताकि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए समय सीमा, रात का गेमिंग कर्फ्यू और स्वास्थ्य चेतावनियां लागू की जा सकें।
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स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए डिजिटल वेलनेस
स्कूलों में डिजिटल वेलनेस को अनिवार्य पाठ्यक्रम बनाया जाना चाहिए जिससे बच्चे समझ सकें कि स्क्रॉल, रिवार्ड सिस्टम, वर्चुअल इंटरैक्शन और लगातार उत्तेजना उनके दिमाग को कैसे प्रभावित करती है। हर जिले में डिजिटल एडिक्शन क्लिनिक स्थापित किए जाने चाहिए जहां मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और साइबर विशेषज्ञ मिलकर बच्चों और अभिभावकों को सहायता दे सकें।
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डोपामाइन आधारित कंटेट पर लगाएं रोक
मोबाइल और टेक कंपनियों को अपने हर डिवाइस में सुरक्षित चाइल्ड मोड शामिल करना चाहिए जिसमें स्क्रीन लिमिट, कंटेंट फिल्टर, पैरेंट नोटिफिकेशन और स्लीप टाइम जैसी सुविधाएं पहले से मौजूद हों। सरकार को सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी कड़े नियम लागू करने होंगे ताकि बच्चों को हानिकारक कंटेंट और डोपामाइन आधारित डिजाइन से बचाया जा सके।
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अधिकारियों को दें डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य पर प्रशिक्षण
कानून व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों को भी डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य पर प्रशिक्षण देना जरूरी है ताकि वे साइबर बुलिंग, गेमिंग लत और ऑनलाइन खतरों से जुड़े मामलों को संवेदनशील रूप से समझ सकें। आत्महत्या जैसे मामलों में डिजिटल बिहेवियर ऑटोप्सी को अनिवार्य किया जाना चाहिए जिससे यह स्पष्ट हो सके कि बच्चा किन ऑनलाइन प्रभावों या दबावों के अधीन था।
उभरती महामारी बन गई है डिजिटल लत
भारत को यह स्वीकारना होगा कि डिजिटल लत एक उभरती हुई मनोवैज्ञानिक महामारी है। यह केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि बच्चों के जीवन, भावनात्मक संतुलन, पढ़ाई, सामाजिक जुड़ाव और भविष्य पर गहरा असर डालने वाला संकट है। अगर हम इस समय उचित कदम नहीं उठाते, तो ऐसी त्रासदियां बढ़ती जाएंगी और समाज इसके लिए तैयार नहीं होगा। हर बच्चे की मानसिक सुरक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है और इसे सुरक्षित करना आज सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
( लेखक सीनियर साइकेट्रिस्ट और अवसाद, अनिद्रा रोग विशेषज्ञ हैं )
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