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अजाक्स प्रांताध्यक्ष संतोष वर्मा द्वारा बेटियों पर की गयी आपत्तिजनक टिप्पणी अचानक और आश्चर्यजनक नहीं है। ऐसा तो होना ही था।
सरकारों का अत्यधिक लाड़ला संगठन रहा है अजाक्स। ज्यादा लाड़ में बिगड़ा है मामला
MP IAS Santosh Verma Controversy:अजाक्स संगठन अन्य कर्मचारी संगठनों की तरह एक कर्मचारी संगठन है, लेकिन सरकारों ने अजाक्स संगठन को अन्य कर्मचारी संगठनों की तुलना में ज्यादा लाड़-प्यार दिया। उसे वीआईपी माना। इसी अनावश्यक लाड़-प्यार की परिणति है कि अजाक्स का प्रांताध्यक्ष निर्वाचित होने के चंद मिनट बाद ही बिल्कुल बेख़ौफ़ होकर बहन-बेटियों के बारे में गंदी बयानबाजी करने का दुस्साहस कर सका।
नीचे कुछ उदाहरण दिए गए हैं, जिनसे अजाक्स को दिए गए अतिशय प्यार-दुलार का परिचय मिलता है-
मंत्रालय में आरक्षित वर्ग के रिक्त पदों की पूर्ति के लिए व्यापम द्वारा 2008-09 में प्रतियोगिता परीक्षा ली गई। 25 प्रतियोगियों को तीनों पेपर्स में 0 (जीरो) अंक प्राप्त हुए। व्यापम ने सामान्य प्रशासन विभाग को रिज़ल्ट शीट भेजी, जिसमें बाकायदा 0 अंक मिलना बताया गया था।
भर्ती नियम के अनुसार 0 अंक वाले नियुक्ति हेतु पात्र नहीं थे, परन्तु चूंकि वे लोग अजाक्स से जुड़े हुए थे, इसलिए सामान्य प्रशासन विभाग ने उन्हें ज्वाइन कराया और पांच साल बाद पदोन्नति भी दी। वे आज भी ठप्पे से कार्यरत हैं। खूब शिकायतें हुईं, परंतु उनका कुछ नहीं बिगड़ा क्योंकि वे अजाक्स से थे और अधिकांश अधिकारी भी उसी वर्ग के थे।
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'0' नम्बर वाले नियुक्त होकर हो गए पदोन्नत
पिछले दिनों प्रदेश के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में आयोजित एक अति उच्चस्तरीय शासकीय बैठक में प्रदेश के अपर मुख्य सचिव गृह अपने पद की बात छोड़कर अजाक्स के प्रांताध्यक्ष के रूप में बोलने लगे। आरक्षण को बढ़ाने की मांग करने लगे। आरक्षित वर्ग के दो और उच्च अधिकारियों ने उनकी बात का समर्थन कर दिया।
बैठक के एजेंडे से हटकर एक वर्ग विशेष की बात करने और सरकारी प्रोटोकॉल तोड़ने के बाद भी कोई एक्शन नहीं लिया गया। यदि उस समय एक्शन लिया गया होता तो शायद आज यह स्थिति निर्मित नहीं होती।
उच्चस्तरीय शासकीय बैठक में भी ‘अजाक्स एजेंडा’
शासन ने अभी जो पदोन्नति नियम बनाए, उसमें यह प्रावधान रखा कि प्रत्येक पदोन्नति समिति में आरक्षित वर्ग के अधिकारी रखना अनिवार्य है। जब सब अधिकारी समान हैं और सभी को नियमानुसार कार्यवाही करना है, तो फिर सरकार ने अपने ही अधिकारियों के बीच विभेद पैदा किया। पदोन्नति समिति की बैठकों में जो अधिकारी नामांकित होते हैं, वे अजाक्स के सदस्य होते हैं। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से अजाक्स को यहां भी वेटेज मिलता है।
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भोपाल में अजाक्स को एक नहीं, तीन सरकारी कार्यालय
अजाक्स को भोपाल में तीन-तीन कार्यालय सरकार द्वारा दिए गए हैं। सेकंड स्टॉप पर बेशकीमती जमीन दी गई, जिस पर करोड़ों रुपए का तीन मंजिला कार्यालय भवन बना हुआ है। भवन बनने के बावजूद सेकंड स्टॉप पर ही एक एफ-टाइप शासकीय आवास भी कार्यालय के लिए दिया गया है। इसके बाद फिर अजाक्स की मंत्रालय शाखा को वल्लभ भवन क्रमांक 01 में एक अलग से कार्यालय दिया गया है।
दूसरी ओर, मंत्रालय कर्मचारी संघ को 1989 से कार्यालय मिला हुआ था। एनेक्सी निर्माण के दौरान वह कार्यालय बंद हो गया। अभी तक 01 उपमुख्यमंत्री, 15 मंत्री, 03 सांसद, 02 पूर्व मंत्री उक्त कार्यालय वापस देने के लिए लिखकर दे चुके हैं। मंत्रालय के 2000 अधिकारी/कर्मी भी लिखकर दे चुके हैं, परंतु वह कार्यालय वापस नहीं हो रहा है। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई, वह जानकारी भी नहीं दी जा रही है।
अजाक्स के एजेंडे के लिए अपने पद का इस्तेमाल करते हैं IAS अधिकारी
अजाक्स का जब गठन हुआ था तब आईएएस अध्यक्ष नहीं होते थे। बाद में आईएएस अध्यक्ष बनने लगे, तब भी शासन की ओर से कोई रोक नहीं लगाई गई। अन्य संगठनों में छोटे कर्मचारी अध्यक्ष होते हैं और अजाक्स में आईएएस अधिकारी। आईएएस अधिकारी अपने पद और पावर का इस्तेमाल अजाक्स के एजेंडे के लिए करते हैं। अन्य कर्मचारी संगठन पीछे रह जाते हैं। इसकी शिकायत भी शासन से की गई थी, परंतु कोई कार्रवाई नहीं हुई।
अजाक्स संगठन को दिए गए इस अति लाड़ ने ही उनके पदाधिकारियों को दुस्साहसी बना दिया है।
{लेखक (Sudhir Nayak) मंत्रालय सेवा अधिकारी कर्मचारी संघ के अध्यक्ष हैं.. यह लेख उनके निजी विचार हैं।}
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