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MP Drinking Water Guidelines: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), सेंट्रल जोन बेंच, भोपाल ने मध्यप्रदेश के शहरों में सीवेज मिला और दूषित पेयजल की आपूर्ति को लोगों के लिए गंभीर खतरा माना है और शुक्रवार,15 जनवरी को एक अहम फैसला सुनाया है।
जस्टिस शिव कुमार सिंह (न्यायिक सदस्य) और ईश्वर सिंह (विशेषज्ञ सदस्य) की पीठ ने कमल कुमार राठी बनाम मध्यप्रदेश शासन और अन्य (O.A. No. 06/2026) मामले की सुनवाई करते हुए राज्य शासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सभी स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय की है। ट्रिब्यूनल ने मामले में जांच के लिए 6 सदस्यीय कमेटी बनाई है। जो 6 हफ्ते में रिपोर्ट पेश करेगी। मामले की अगली सुनवाई 30 मार्च को होगी।
भोपाल के तालाबों में दूषित पानी की मात्रा का स्तर खतरनाक
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर वकील हरप्रीत सिंह गुप्ता ने पैरवी की। कोर्ट में उनके साथ सहयोगियों के रूप में एडवोकेट प्रतिपाल सिंह गुप्ता, नैन्सी चतुर्वेदी, चिन्मय सिंह कुल्हारा और सृजन जैन उपस्थित रहे। लीगल टीम ने तर्क दिया कि भोपाल के तालाबों में फेकल कोलीफॉर्म (मल के बैक्टीरिया जीवाणु) की मात्रा खतरनाक स्तर (1600 मिली) पर है और सीवेज लाइनें पेयजल लाइनों को दूषित कर रही हैं, जो सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन के अधिकार का हनन है।
NGT ने पानी की जांच के लिए बनाई कमेटी
मामले की गंभीरता को देखते हुए, ट्रिब्यूनल ने जमीनी हकीकत की जांच के लिए 6-सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जो 6 हफ्ते में अपनी रिपोर्ट देगी।
कमेटी में बनाए गए ये सदस्य
आईआईटी (IIT), इंदौर के निदेशक द्वारा नामांकित विशेषज्ञ।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), भोपाल के प्रतिनिधि।
प्रमुख सचिव, पर्यावरण विभाग, म.प्र. शासन।
प्रमुख सचिव, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग।
जल संसाधन विभाग के प्रतिनिधि।
म.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) के प्रतिनिधि (नोडल एजेंसी)।
कलेक्टर और निगमायुक्तों को निर्देश
एनजीटी ने विशेष रूप से आदेश दिया है कि इस फैसले की प्रति मध्यप्रदेश के सभी जिलों के कलेक्टर (District Collectors) और सभी नगर निगम आयुक्तों (Municipal Commissioners) को भेजी जाए, ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में इन निर्देशों का तत्काल पालन सुनिश्चित कर सकें।
NGT की गाइडलाइन
कोर्ट ने राज्य भर में शुद्ध पेयजल की सप्लाई करने के लिए विस्तृत 14-सूत्रीय दिशा- निर्देश जारी किए हैं...
MIS और 24x7 वाटर ऐप: एक मजबूत 'प्रबंधन सूचना प्रणाली' (MIS) और मोबाइल ऐप बनाया जाए, जिस पर पानी की गुणवत्ता रिपोर्ट, सप्लाई का समय और शिकायत निवारण की जानकारी हो।
GIS मैपिंग: पूरे राज्य में पेयजल और सीवेज लाइनों की 'GIS-आधारित मैपिंग' हो ताकि यह पता चले कि कहां सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल रहा है।
एरेशन और क्लोरीनेशन: पानी की शुद्धता के लिए प्री-क्लोरीनेशन, पोस्ट-क्लोरीनेशन के साथ-साथ 'एरेशन प्रक्रिया' (Aeration process) अनिवार्य रूप से अपनाई जाए।
टैंकों की सफाई: सभी ओवरहेड टैंकों और सम्प-वेल (Sumps) को हमेशा चालू रखा जाए और उनकी नियमित सफाई और क्लोरीनेशन हो।
पाइपलाइन मरम्मत: लीकेज और ट्रांसमिशन लॉस को रोकने के लिए युद्धस्तर पर पाइपलाइनों की मरम्मत हो।
अतिक्रमण हटाना: जल स्रोतों (तालाब, कुएं, बावड़ी) के आसपास से सभी प्रकार के अतिक्रमण तुरंत हटाए जाएं।
ग्रीष्मकालीन जल प्रबंधन: मार्च से जुलाई के बीच पानी की कमी को देखते हुए निर्माण कार्यों पर रोक लगे और वार्ड-वार राशनिंग (वैकल्पिक दिन) की व्यवस्था हो।
वाटर रिचार्ज (Recharge): सार्वजनिक कुओं और बावड़ियों को पुनर्जीवित (Regenerate) करने की योजना लागू की जाए।
सख्त वाटर हार्वेस्टिंग: सरकारी और निजी भवनों (स्कूल/कॉलेज सहित) में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य हो। पालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई (Punitive action) की जाए।
क्या करें-क्या न करें
नागरिकों के लिए पानी के उपयोग के संबंध में 'Do's and Don'ts' जारी किए जाएं।
डेयरियों का विस्थापन: शहर सीमा के भीतर 2 से अधिक पशुओं वाली सभी डेयरियों को 4 महीने के भीतर शहर से बाहर शिफ्ट किया जाए।
मूर्ति विसर्जन पर पूर्ण रोक: किसी भी पेयजल स्रोत (डैम, तालाब) में मूर्तियों का विसर्जन पूरी तरह प्रतिबंधित रहे।
मीटरिंग: सभी घरेलू और व्यावसायिक पानी के कनेक्शनों पर मीटर लगाए जाएं।
टैंकर आपूर्ति: जल संकट के समय टैंकरों से आपूर्ति के लिए पूर्व निर्धारित शर्तों के साथ योजना तैयार की जाए।
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