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Ajit Pawar life and controvercy: महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार का 28 जनवरी की सुबह विमान हादसे में निधन हो गया। पवार महाराष्ट्रा की राजनीति में लंबे समय तक केंद्र में रहने वाला चेहरा हैं। अपनी लम्बी पारी में पवार कई विवादों के बीच घिरे रहे थे।
महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार ऐसा नाम रहे हैं जो हमेशा सत्ता के बेहद करीब दिखाई दिया, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी से हमेशा एक कदम दूर उपमुख्यमंत्री पद पर कई बार रहने वाले अजित पवार को एक सख्त प्रशासक, तेज फैसले लेने वाले नेता और सत्ता के समीकरणों को साधने वाले रणनीतिकार के रूप में जाना जाएगा। वहीं दूसरी ओर उनका पूरा राजनीतिक सफर लगातार विवादों, आरोपों और सत्ता संघर्षों से घिरा रहा, जिसने उन्हें राज्य की राजनीति का सबसे कंट्रोवर्सियल चेहरा बना दिया।
विरासत से आगे अपनी सियासी पहचान
22 जुलाई 1959 को जन्मे अजित पवार ने 1991 में पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा में कदम रखा। शरद पवार के भतीजे होने के कारण शुरुआती दौर में उन्हें राजनीतिक विरासत का लाभ जरूर मिला, लेकिन पश्चिमी महाराष्ट्र में संगठन पर मजबूत पकड़ और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच प्रभाव के चलते उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। धीरे-धीरे वह एनसीपी के भीतर सबसे ताकतवर नेताओं में गिने जाने लगे और सरकार गठन से लेकर प्रशासनिक फैसलों तक उनकी भूमिका निर्णायक मानी जाने लगी।
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सिंचाई और जमीन के आरोपों से बनी ‘विवादित’ छवि
अजित पवार का नाम सबसे ज्यादा सिंचाई परियोजनाओं और भूमि से जुड़े कथित मामलों में सामने आया। विपक्षी दलों ने उन पर आरोप लगाए कि कुछ बड़ी सिंचाई योजनाओं में वित्तीय अनियमितताएं हुईं और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई। इन मामलों में समय-समय पर जांच की मांग उठती रही। हालांकि अब तक कोई भी आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ, लेकिन राजनीतिक स्तर पर इन विवादों ने उनकी छवि को लगातार सवालों के घेरे में रखा।
मुख्यमंत्री की कुर्सी से क्यों रहे दूर
इतनी ताकत, अनुभव और संगठन पर पकड़ के बावजूद अजित पवार मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन पाए, यह सवाल महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से चर्चा में रहा। वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, गठबंधन की मजबूरियां, शरद पवार की रणनीतिक भूमिका और खुद अजित पवार की आक्रामक और कई बार असहज कर देने वाली कार्यशैली इसके बड़े कारण माने जाते हैं। वह सत्ता के संचालन में अहम भूमिका निभाते रहे, लेकिन सरकार का चेहरा बनने से हमेशा दूर रखे गए।
2019 का सियासी धमाका
2019 में भाजपा के साथ अचानक सरकार गठन की कोशिश ने अजित पवार को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ एनसीपी को दो हिस्सों में बांट दिया, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा भी बदल दी। इसके बाद पार्टी टूट, गुटबाजी और सत्ता समीकरणों का दौर शुरू हुआ, जिसमें अजित पवार एक बार फिर सत्ता के केंद्र में दिखाई दिए।
विवादों के बीच भी कायम सियासी पकड़
लगातार आरोपों और आलोचनाओं के बावजूद अजित पवार की सबसे बड़ी ताकत उनकी विधायकों पर पकड़ और चुनावी गणित की समझ रही। राजनीतिक संकटों के दौर में भी वह सत्ता से पूरी तरह बाहर नहीं हुए। समर्थक उन्हें काम कराने वाला नेता मानते रहे, जबकि विरोधी उन्हें सत्ता की राजनीति का सबसे कठोर खिलाड़ी बताते रहे।
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