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Prashant Singh Resignation Controversy: अयोध्या के GST डिप्टी कमिश्नर सीएम योगी आदित्यनाथ के समर्थन में इस्तीफा देकर खुद घिर गए हैं। फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र से नौकरी पाने की जांच के बीच एक और खुलासा हुआ है। अब मालूम चला है कि प्रशांत सिंह बीजेपी विधायक बनना चाहते थे।
मऊ से की थी टिकट की दावेदारी
पूर्व GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत सिंह ने 2022 में कानपुर GST विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर की पोस्ट पर रहते हुए बीजेपी से मऊ विधानसभा टिकट की दावेदारी की थी। उन्होंने बैनर-पोस्टर लगाकर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की थी।
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प्रशांत सिंह को नहीं मिला टिकट
प्रशांत सिंह को बीजेपी ने टिकट नहीं दिया। इसके बाद उन्होंने नौकरी से इस्तीफा नहीं दिया। कुछ समय बाद प्रशांत सिंह प्रमोट होकर डिप्टी कमिश्नर बन गए और अयोध्या में उनकी पोस्टिंग हुई।
बड़े भाई ने लगाए आरोप
इस्तीफा देने के बाद प्रशांत कुमार सिंह पर फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी पाने का गंभीर आरोप उनके बड़े भाई डॉ. विश्वजीत ने लगाया। विश्वजीत सिंह का दावा किया कि प्रशांत कुमार सिंह को फर्जी विकलांग सर्टिफिकेट के जरिए सरकारी नौकरी मिली है। डॉ. विश्वजीत सिंह ने 2021 में ही इसकी शिकायत दर्ज कराई थी। 20 अगस्त 2021 को उन्होंने प्रशांत कुमार सिंह के दिव्यांग प्रमाण पत्र के पुनः निरीक्षण की मांग की। इसके बाद मंडलीय चिकित्सा परिषद ने उन्हें मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने के लिए बुलाया, लेकिन वे 2 बार पेश नहीं हुए।
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CMO मऊ ने शुरू की जांच
प्रशांत कुमार सिंह के बड़े भाई विश्वजीत सिंह ने एक लेटर भी वायरल किया, जिसमें मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को प्रशांत कुमार सिंह के दिव्यांग प्रमाण पत्र की जांच दोबारा कराने को कहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस्तीफा देना भी सिर्फ एक नाटक था, ताकि जांच और संभावित रिकवरी से बचा जा सके। डॉ. विश्वजीत सिंह के मुताबिक प्रशांत कुमार सिंह ने जिस आंख की बीमारी को दिखाकर दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाया, वैसी बीमारी 50 साल से कम उम्र में किसी को होती नहीं है। इस मामले में CMO मऊ ने जांच शुरू कर दी है।
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प्रशांत सिंह ने कहा-मुख्यमंत्री का सार्वजनिक अपमान मुझे स्वीकार नहीं
प्रशांत कुमार सिंह ने इस्तीफा देने के समय कहा कि शंकराचार्य द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ की गई टिप्पणी से वे गहराई से आहत हैं। उन्होंने कहा कि जिस प्रदेश का नमक और रोटी खाता हूं, जिस सरकार के वेतन पर मेरा परिवार चलता है, उसी प्रदेश के मुख्यमंत्री का सार्वजनिक अपमान मुझे स्वीकार नहीं। उन्होंने अपने इस्तीफे में लिखा कि संविधान में विरोध के तरीके तय हैं, लेकिन पालकी पर बैठकर मुख्यमंत्री के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग समाज को तोड़ने वाला काम है। ऐसे बयान जातिगत वैमनस्य फैलाते हैं, जिसका वे खुलकर विरोध करते हैं।
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