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MP के जज सुलिया की बर्खास्तगी रद्द: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- गलत फैसले पर जज को सजा नहीं...

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 5 जनवरी को मध्य प्रदेश के न्यायिक अधिकारी निर्भय सिंह सुलिया की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी भी की।

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BP Shrivastava
Nirbhay Singh Suliya vs MP Govt

Nirbhay Singh Suliya vs MP Govt: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 5 जनवरी को मध्य प्रदेश के न्यायिक अधिकारी निर्भय सिंह सुलिया की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल गलत या त्रुटिपूर्ण न्यायिक आदेश पारित करने के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। कोर्ट ने माना कि बिना उचित प्रक्रिया (ड्यू प्रोसेस) अपनाए की गई कार्रवाई न्यायिक स्वतंत्रता के लिए घातक है।

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सुलिया पर डबल स्टैंडर्ड अपनाने के लगे थे आरोप

न्यायिक अधिकारी निर्भय सिंह सुलिया को वर्ष 2014 में सेवा से हटा दिया गया था। उस समय वे खरगोन में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर पदस्थ थे। उन पर भ्रष्टाचार और आबकारी अधिनियम से जुड़े मामलों में जमानत याचिकाओं पर डबल स्टैंडर्ड  अपनाने के आरोप लगाए गए थे। आरोप था कि 50 बल्क लीटर से अधिक शराब जब्ती के कुछ मामलों में उन्होंने जमानत दी, जबकि समान परिस्थितियों वाले अन्य मामलों में जमानत खारिज की।

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की

विभागीय जांच के बाद एमपी हाईकोर्ट ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था। इस आदेश को चुनौती देने पर जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि 27 वर्षों तक बेदाग सेवा देने वाले न्यायिक अधिकारी को बिना ठोस आधार और विधि-सम्मत प्रक्रिया के हटाया जाना न्याय संगत नहीं है।

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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

  • कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई में हाईकोर्ट को अत्यधिक सतर्कता बरतनी चाहिए।

  • केवल गलत आदेश के आधार पर यांत्रिक कार्रवाई न्यायिक विवेक और स्वतंत्रता को कमजोर करती है।

  • प्रशासनिक कार्रवाई के डर से निचली अदालतों में जमानत देने की प्रवृत्ति प्रभावित होती है, जिससे अनावश्यक रूप से मामले उच्च अदालतों तक पहुंचते हैं।

  • न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ झूठी और निराधार शिकायतों पर सख्त रुख अपनाने की जरूरत है। यदि शिकायतकर्ता वकील हो, तो मामला बार काउंसिल को भेजा जाना चाहिए।

  • कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला भ्रष्टाचार को संरक्षण नहीं देता। यदि कदाचार प्रथम दृष्टया साबित हो, तो त्वरित और सख्त कार्रवाई जरूरी है।

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