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World Pulses Day 2026: भारत दुनिया का सबसे बड़ा दालों का उत्पादत और उपभोक्ता होने के बाद भी दालों के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है। देश की थाली में प्रोटीन का सबसे अहम स्रोत मानी जाने वाली दालें आज भी आयात के सहारे उपलब्ध हो रही हैं। यही कारण है कि जैसे ही इंटरनेशनल मार्केट में हलचल होती है, दालों के दाम आम आदमी की पहुंच से बाहर होने लगते हैं।
क्यों नहीं बन पाया भारत आत्मनिर्भर
दालों की बढ़ती कीमतों और घटती उपलब्धता के पीछे कई कारण हैं। जैसे मानसून की अनिश्चितता, सूखा और बेमौसम बारिश, किसानों का नकदी फसलों की ओर झुकाव, दालों की खेती से अपेक्षित लाभ न मिलना
विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ नीतियों ने भी इस संकट को गहराया है। जैसे खाद्यान्न के बजाय ईंधन, फूलों और औद्योगिक फसलों को बढ़ावा दिया गया, जिससे दालों का उत्पादन का घटता चला गया। साथ ही, भूमंडलीकरण के दौर में दाल उत्पादन क्षेत्र लगभग 15 हजार हेक्टेयर तक सिमट गया।
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मांग-आपूर्ति की खाई और जमाखोरी
भारत में दालों की सालाना खपत 220 से 230 लाख टन के बीच है। वहीं मांग और उत्पादन के इस अंतर का फायदा जमाखोरों और आयातक व्यापारियों को मिलता रहा है। आयात पर निर्भरता के चलते बाजार में सट्टेबाजी और असहज महंगाई की स्थिति बनती है।
केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के मुताबिक दालों के खुदरा भाव फिलहाल 85.42 रुपये से 112.88 रुपये प्रति किलो के बीच बने हुए हैं। हालांकि सरकार ने सितंबर 2024 से भंडारण की सीमा तय कर कीमतों को नियंत्रित करने का प्रयास किया है।
गरीब और मध्यम वर्ग की थाली से गायब होती दाल
दालें केवल भोजन नहीं, बल्कि देश के नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा सवाल हैं। संविधान में भोजन का अधिकार निहित है और दालें प्रोटीन का प्रमुख स्रोत मानी जाती हैं। 1951 में जहां प्रति व्यक्ति दाल उपलब्धता 60 ग्राम प्रतिदिन थी, वहीं 2010 तक यह घटकर 34 ग्राम रह गई।
इंटरनेशनल स्टंडर्डस के मुताबिक यह मात्रा 80 ग्राम होनी चाहिए। बीमारी की स्थिति में भी डॉक्टर दाल-रोटी खाने की सलाह देते हैं, लेकिन बढ़ती कीमतों के कारण दालें गरीब और मध्यम वर्ग की थाली से धीरे-धीरे गायब होती जा रही हैं।
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35,440 करोड़ रुपये का निवेश
इसी चुनौती से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और समाज सुधारक नानाजी देशमुख की प्रेरणा से जयप्रकाश नारायण की जयंती पर दो अहम कृषि योजनाओं की शुरुआत की गई थी। 'धन-धान्य आत्मनिर्भरता मिशन और दलहन आत्मनिर्भरता' मिशन के तहत सरकार ने कुल 35,440 करोड़ रुपये के निवेश का प्रावधान किया था, जिनका मकसद देश के 100 पिछड़े जिलों में कृषि उत्पादकता बढ़ाना, फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना और दलहन उत्पादन को नई ऊंचाई तक ले जाना था।
2030-31 तक बड़ा लक्ष्य
सरकार ने दाल उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए 2030-31 तक उत्पादन को 252 लाख टन से बढ़ाकर 350 लाख टन करने का लक्ष्य तय किया है। जिसके लिए 35 लाख हेक्टेयर ज्यादा जमीन को दाल उत्पादन के दायरे में लाने की योजना है। मगर, विडंबना यह है कि भारत जहां दलहन उत्पादन और खपत दोनों में दुनिया में शीर्ष पर है, वहीं दालों की आपूर्ति आज भी आयात पर निर्भर बनी हुई है।
किसान की मजबूरी
दालों की खेती मेहनत और समय दोनों मांगती है। तुअर जैसी फसल को तैयार होने में लगभग 8 महीने लगते हैं, लेकिन इसके बावजूद किसान को उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
ऐसे में किसान साल में एक ही फसल लेने का जोखिम उठाने से कतराता है और नकदी फसलों की ओर रुख करता है।
देश में सबसे अधिक चना और अरहर की खेती होती है। मूंग और उड़द भी प्रमुख दलहन हैं। करीब 10 राज्यों में दालों का उत्पादन होता है, जिनमें मध्यप्रसदेश सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है।
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मध्यप्रदेश उत्पादन की रीढ़ पर संभावनाएं अधूरी
दालों के उत्पादन के मामले में मध्यप्रदेश देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है। चना, अरहर, मसूर, मूंग और उड़द जैसी प्रमुख दालों का बड़ा हिस्सा यहीं पैदा होता है। खासकर चना उत्पादन में मध्यप्रदेश को देश की “चना कटोरी” भी कहा जाता है। इसके बावजूद राज्य में दलहन खेती की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं हो पा रहा है।
सिंचाई सुविधाओं की असमान उपलब्धता, समर्थन मूल्य पर समय पर खरीदी की समस्या और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पादन प्रभावित होता है। कई जिलों में किसान आज भी दालों की बजाय सोयाबीन और गेहूं जैसी अपेक्षाकृत सुरक्षित फसलों को प्राथमिकता देते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केंद्र सरकार की दालों पर आत्मनिर्भरता योजनाएं मध्यप्रदेश के पिछड़े और अर्ध-सिंचित जिलों में प्रभावी ढंग से लागू होती हैं, तो राज्य न सिर्फ अपनी उत्पादकता बढ़ा सकता है, बल्कि देश को दालों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
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