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छत्तीसगढ़ में यूनिवर्सिटी की जांच से पहले राज्यपाल की अनुमति जरूरी: अंतिम फैसले के लिए भी भी लेनी होगी स्वीकृति, चल रही जांचों पर पड़ेगा असर

छत्तीसगढ़ की सभी शासकीय यूनिवर्सिटियों में अब किसी भी अधिकारी, शिक्षक या कर्मचारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले राज्यपाल की अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है।

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Harsh Verma
CG University Inquiry Order

CG University Inquiry Order: छत्तीसगढ़ की शासकीय यूनिवर्सिटियों से जुड़ी प्रशासनिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव किया गया है। अब प्रदेश की किसी भी सरकारी यूनिवर्सिटी में अधिकारी, शिक्षक या कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने से पहले छत्तीसगढ़ के राज्यपाल की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। इतना ही नहीं, जांच पूरी होने के बाद अंतिम निर्णय लेने के लिए भी कुलाधिपति यानी राज्यपाल की स्वीकृति जरूरी होगी।

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यह आदेश लोक भवन की ओर से जारी किया गया है। आदेश सामने आने के बाद राज्य में उच्च शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर नई बहस छिड़ गई है। कई जानकार इसे राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर संभावित टकराव की स्थिति के रूप में देख रहे हैं।

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पहले क्या थी व्यवस्था, अब क्या बदला

जांच पूरी होने के बाद अंतिम निर्णय लेने के लिए भी कुलाधिपति यानी राज्यपाल की स्वीकृति जरूरी रहेगी।

अब तक विश्वविद्यालयों में यह व्यवस्था लागू थी कि कुलपति स्तर तक के मामलों में राज्यपाल का अधिकार क्षेत्र माना जाता था। वहीं कुलसचिव, अधिकारी, शिक्षक और कर्मचारियों से जुड़े मामलों में राज्य सरकार और उच्च शिक्षा विभाग निर्णय लेते थे।

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लेकिन नए आदेश के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब कुलसचिव या प्रभारी कुलसचिव को छोड़कर बाकी सभी अधिकारियों, शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले राज्यपाल की अनुमति लेना जरूरी होगा। इससे विश्वविद्यालयों में चल रही या प्रस्तावित कई विभागीय जांचों की प्रक्रिया लंबी और जटिल होने की आशंका जताई जा रही है।

चल रही जांचों पर पड़ेगा असर

बिलासपुर के अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर शिकायत की गई थी। (फाइल इमेज)

प्रदेश में इस समय कई शासकीय विश्वविद्यालयों में विभागीय जांच चल रही है। इनमें छत्तीसगढ़ कृषि विश्वविद्यालय से जुड़ा बीज घोटाला, अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय में कथित भ्रष्टाचार और आदर्श महाविद्यालय लोहारकोट में जेम पोर्टल के जरिए 1.06 करोड़ रुपये की खरीदी जैसे मामले शामिल हैं।

नए आदेश के बाद इन सभी मामलों की जांच प्रक्रिया पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि अनुमति की नई प्रक्रिया के कारण निर्णय में देरी हो सकती है।

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15 शासकीय विश्वविद्यालयों का दिया गया हवाला

लोक भवन की ओर से जारी आदेश में प्रदेश के 15 शासकीय विश्वविद्यालयों से जुड़े अधिनियमों का हवाला दिया गया है। इन अधिनियमों के तहत राज्यपाल विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति होते हैं। इसी आधार पर कहा गया है कि नियुक्ति प्रक्रिया, अनुशासनात्मक कार्रवाई और जांच से जुड़े हर महत्वपूर्ण निर्णय में कुलाधिपति की स्वीकृति आवश्यक होगी।

विश्वविद्यालय प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि किसी भी नियुक्ति या जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले आवश्यक अनुमोदन लिया जाए और जांच पूरी होने के बाद अंतिम निर्णय भी बिना अनुमति लागू न किया जाए।

अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय का मामला चर्चा में

बिलासपुर स्थित अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय में कथित भ्रष्टाचार का मामला पहले से ही सुर्खियों में है। 5 जून 2025 को छात्रों ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और बिल्हा विधायक धरमलाल कौशिक से शिकायत की थी।

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छात्रों का आरोप है कि प्रभारी कुलसचिव डॉ. शैलेंद्र दुबे और कुलपति प्रो. एडीएन वाजपेई की मिलीभगत से प्रशासनिक, शैक्षणिक और वित्तीय कार्यों में अनियमितताएं हुई हैं। कुलपति के निज सहायक उपेन चंद्राकर की नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठे हैं। छात्रों का कहना है कि उनका प्रमाण पत्र एनसीटीई से मान्य नहीं है और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट इसे अमान्य घोषित कर चुका है।

अधिकारों को लेकर बढ़ती बहस

इस नए आदेश के बाद उच्च शिक्षा विभाग, विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य सरकार की भूमिका को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारों का मानना है कि इससे एक ओर जहां कुलाधिपति की भूमिका और मजबूत होगी, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार के प्रशासनिक अधिकार सीमित होते नजर आ सकते हैं।

कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ की शासकीय यूनिवर्सिटियों में जांच से जुड़ा यह नया नियम आने वाले दिनों में शिक्षा व्यवस्था और राजनीति दोनों में चर्चाओं का केंद्र बना रह सकता है।

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