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CSVTU भिलाई में बड़ा वित्तीय घोटाला उजागर: PhD प्रकोष्ठ में फर्जी रसीदों से 9.44 लाख का गबन, जांच समिति की रिपोर्ट के बाद FIR का फैसला

छत्तीसगढ़ के स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय (CSVTU) भिलाई के पीएचडी प्रकोष्ठ में फीस वसूली के नाम पर करीब 9.44 लाख रुपये के गबन का मामला सामने आया है।

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Harsh Verma
Bhilai CSVTU PhD Fee Scam

Bhilai CSVTU PhD Fee Scam: छत्तीसगढ़ के एकमात्र तकनीकी विश्वविद्यालय स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय (CSVTU) भिलाई में गंभीर वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है। विश्वविद्यालय के पीएचडी प्रकोष्ठ में शोधार्थियों से फीस वसूली के नाम पर बड़ा घोटाला किया गया। विश्वविद्यालय द्वारा गठित दो सदस्यीय जांच समिति की प्रारंभिक रिपोर्ट में कुल 9 लाख 44 हजार 500 रुपये के गबन की पुष्टि हुई है।

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फर्जी रसीदों से की गई फीस वसूली

जांच में सामने आया कि पीएचडी शोधार्थियों से नकद और ऑनलाइन दोनों माध्यमों से पैसे लिए गए, लेकिन बदले में उन्हें फर्जी रसीदें थमाई गईं। कई मामलों में तो विश्वविद्यालय के वित्त विभाग में इन भुगतानों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं मिला। मामले की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे सिर्फ आंतरिक अनुशासन का मामला न मानते हुए कानूनी कार्रवाई की ओर कदम बढ़ाया है।

जांच समिति का गठन और शुरुआती बैठक

विश्वविद्यालय प्रशासन ने 1 दिसंबर 2025 को पीएचडी प्रकोष्ठ में वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए दो सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति की पहली बैठक 15 दिसंबर 2025 को हुई, जिसमें तत्कालीन पीएचडी प्रकोष्ठ प्रभारी डॉ. एस.आर. ठाकुर उपस्थित रहे। बैठक में थीसिस सबमिशन फीस से जुड़ी कई रसीदों की जांच की गई, जिन पर संदेह जताया गया।

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पूर्व अफसरों की भूमिका भी जांच के घेरे में

जांच के दौरान यह बात सामने आई कि संबंधित अवधि में पीएचडी प्रकोष्ठ का काम कनिष्ठ सलाहकार सुनील कुमार प्रसाद द्वारा किया जा रहा था। यह कार्य तत्कालीन अकादमिक प्रभारी डॉ. दीप्ती वर्मा के निर्देशन में हो रहा था। समिति ने जनवरी 2024 से अब तक के सभी थीसिस सबमिशन, RDC और नोटिफिकेशन मामलों से जुड़ी फीस रसीदें प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।

52 मामलों की जांच, 30 में गड़बड़ी

समिति ने कुल 52 प्रकरणों की जांच की।
22 मामलों में शोधार्थियों ने सीधे विश्वविद्यालय के खाते में ऑनलाइन भुगतान किया था, जो सही पाया गया।
बाकी 30 प्रकरणों में गंभीर अनियमितताएं सामने आईं।
11 मामलों में जो कैश रसीदें संलग्न थीं, वे वित्त शाखा के सत्यापन में फर्जी निकलीं।
19 मामलों में किसी भी प्रकार की रसीद या भुगतान का कोई प्रमाण नहीं मिला।
16 नकद पावती रसीदों को जब वित्त शाखा से जांचा गया, तो सभी फर्जी पाई गईं।

शोधार्थियों के बयान से खुली परतें

30 दिसंबर 2025 को हुई बैठक में पीएचडी शोधार्थियों को बयान दर्ज कराने बुलाया गया। सात शोधार्थी स्वयं उपस्थित हुए, जबकि अन्य ने ईमेल से बयान भेजे। सभी ने बताया कि उन्होंने फीस का भुगतान सुनील कुमार प्रसाद के कहने पर किया था। भुगतान या तो नकद दिया गया या फिर सुनील कुमार प्रसाद अथवा उनके परिचितों के बैंक खातों में ऑनलाइन ट्रांसफर किया गया।

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कनिष्ठ सलाहकार ने स्वीकार की रकम लेने की बात

जांच समिति के सामने पेश होकर सुनील कुमार प्रसाद ने स्वीकार किया कि उन्होंने शोधार्थियों से नकद और ऑनलाइन राशि ली थी और रसीदें भी उन्हीं के द्वारा दी गई थीं। हालांकि उन्होंने दावा किया कि यह सब तत्कालीन प्रभारी कुलसचिव अंकित अरोरा के निर्देश पर किया गया, लेकिन इस दावे के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं दे सके।

कुलसचिव ने आरोपों से किया इनकार

वहीं, तत्कालीन प्रभारी कुलसचिव अंकित अरोरा ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए स्वतंत्र जांच, हैंडराइटिंग एक्सपर्ट और साइबर जांच कराने की अनुमति देने की बात कही। डॉ. दीप्ती वर्मा ने भी फर्जी रसीदों की जानकारी से इनकार किया।

कार्य परिषद का सख्त फैसला

जांच रिपोर्ट के आधार पर विश्वविद्यालय की कार्य परिषद की बैठक 22 जनवरी 2026 को हुई। इसमें सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि सुनील कुमार प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। साथ ही अन्य अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका की भी विस्तृत जांच कराई जाएगी। विश्वविद्यालय प्रशासन ने नेवई थाना में आवेदन देकर कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

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