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Durg Hotel Police Action Case: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक होटल में पुलिस की कथित जबरन घुसपैठ और कार्रवाई का मामला अब न्यायिक जांच के बाद गंभीर टिप्पणी तक पहुंच गया है। पुलिस एक गुमशुदा लड़की की तलाश के नाम पर होटल पहुंची थी, जहां पहले मैनेजर से बदतमीजी की गई और फिर होटल के कमरे में घुसकर वहां ठहरे महिला-पुरुष को बाहर निकाला गया। विरोध करने पर होटल मालिक के साथ मारपीट कर उसे बिना FIR जेल भेज दिया गया।
पीड़ित कारोबारी ने हाईकोर्ट का खटखटाया दरवाजा
घटना के बाद होटल संचालक आकाश कुमार साहू ने अपने वकील के माध्यम से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता भिलाई के अवंतीबाई चौक का निवासी है और लॉ स्टूडेंट होने के साथ-साथ कोहका में होटल संचालित करता है। याचिका में उन्होंने पुलिस की कार्रवाई और अपनी गिरफ्तारी को पूरी तरह अवैध बताया।
वैध दस्तावेजों के बावजूद कार्रवाई
याचिका में कहा गया कि होटल में ठहरे सभी लोगों ने वैध पहचान दस्तावेज, जैसे आधार कार्ड, जमा किए थे। ऐसे में पुलिस को किसी भी प्रकार की तलाशी या कार्रवाई से पहले कानूनी अनुमति लेनी चाहिए थी। इसके बावजूद बिना महिला पुलिस बल के कमरे में घुसकर तलाशी ली गई और होटल स्टाफ के साथ दुर्व्यवहार किया गया।
मारपीट और बिना FIR गिरफ्तारी का आरोप
याचिकाकर्ता के अनुसार, 8 सितंबर 2025 को पुलिस दो बार होटल पहुंची। दूसरी बार कथित चोरी का झूठा आरोप लगाकर कमरों की तलाशी ली गई। होटल मैनेजर की बेरहमी से पिटाई की गई और बाद में मालिक को बुलाकर उसके साथ गाली-गलौज, मारपीट और अपमान किया गया। इसके बाद बिना किसी वैध कारण और FIR के उसे हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया।
पुलिस का पक्ष: सरकारी काम में बाधा
पुलिस अधिकारियों ने अदालत में कहा कि वे गुमशुदा लड़की की तलाश में होटल गए थे। उनका दावा था कि होटल संचालक ने सरकारी काम में बाधा डाली, पुलिस वाहन की चाबी छीनी और ड्राइवर से हाथापाई की, जिससे शांति भंग होने का खतरा पैदा हुआ। इसी आधार पर उसे भारतीय न्याय संहिता धारा 170 के तहत हिरासत में लिया गया।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी संज्ञेय अपराध में FIR दर्ज नहीं थी। केवल संदेह और कहासुनी के आधार पर किसी नागरिक को जेल भेजना असंवैधानिक है। अदालत ने कहा कि हिरासत में दिया गया मानसिक तनाव और अपमान अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल शामिल थे, ने एसडीएम की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट को न्यायिक प्रहरी की भूमिका निभानी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने बिना विचार किए पुलिस रिपोर्ट पर मुहर लगा दी।
1 लाख का जुर्माना, कार्रवाई रद्द
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ शुरू की गई सभी आपराधिक कार्रवाइयों को रद्द कर दिया और राज्य सरकार को 4 सप्ताह में 1 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। साथ ही सरकार को यह छूट दी गई कि जांच के बाद दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से यह राशि वसूल की जा सकती है। देरी होने पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
मानवाधिकारों पर संवेदनशीलता की जरूरत
अदालत ने टिप्पणी की कि पुलिस के अवैध कार्य और गैरकानूनी रिमांड से आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का भरोसा कमजोर होता है। हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ गृह विभाग के सचिव को निर्देश दिया कि पुलिस बल को मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोहराई न जाएं।
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