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बिलासपुर हाईकोर्ट का सख्त रुख: पुनर्विचार याचिका को बताया कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग, सरकारी कर्मचारी पर 50 हजार का जुर्माना लगाया

Bilaspur High Court: बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक सरकारी कर्मचारी की पुनर्विचार याचिका को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए खारिज कर दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।

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Harsh Verma
Bilaspur High Court

Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह साफ संदेश दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने एक सरकारी कर्मचारी द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए उसे “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” करार दिया है। साथ ही याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।

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इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने की। खंडपीठ ने न सिर्फ याचिका को निरस्त किया, बल्कि याचिकाकर्ता के रवैये पर भी तीखी टिप्पणी की।

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क्या है पूरा मामला

याचिकाकर्ता संजीव कुमार यादव एक सरकारी कर्मचारी हैं। जिला पंचायत जशपुर और सरगुजा संभाग के कमिश्नर द्वारा वर्ष 2017 और 2018 में उनके खिलाफ विभागीय जांच की गई थी। जांच में दोषी पाए जाने के बाद उनके चार वार्षिक वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) को संचयी प्रभाव से रोकने का आदेश दिया गया था।

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इस आदेश को चुनौती देते हुए संजीव कुमार यादव ने पहले हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनका तर्क था कि विभागीय जांच में उन्हें गवाहों से जिरह का मौका नहीं दिया गया और पूरी जांच प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ थी।

एक-एक कर खारिज होती गईं याचिकाएं

23 जनवरी 2025 को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि विभागीय जांच पूरी तरह निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार की गई थी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने रिट अपील दायर की, जिसे खंडपीठ ने 18 मार्च 2025 को खारिज कर दिया।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां 8 अगस्त 2025 को विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) भी खारिज कर दी गई।

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फिर से हाईकोर्ट पहुंचा मामला

सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने के बाद याचिकाकर्ता ने एक बार फिर बिलासपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और पुनर्विचार याचिका दायर की। इसमें दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट ने एसएलपी को शुरुआती स्तर पर खारिज किया था, गुण-दोष के आधार पर नहीं, इसलिए हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की जा सकती है।

याचिका में यह भी कहा गया कि 18 मार्च 2025 के आदेश में तथ्यात्मक त्रुटि है। याचिकाकर्ता का दावा था कि जांच रिपोर्ट उन्हें कभी नहीं दी गई, जबकि कोर्ट के आदेश में रिपोर्ट 9 जून 2016 को मिलने का उल्लेख है।

कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका

हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुनर्विचार याचिका का दायरा बेहद सीमित होता है और इसे अपील की तरह दोबारा सुनवाई के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

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सबसे अहम बात यह रही कि कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा हर स्तर पर अलग-अलग वकील नियुक्त करने की प्रवृत्ति पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि इससे साफ होता है कि याचिकाकर्ता भ्रामक याचिकाएं दाखिल कर न्यायालय का कीमती समय बर्बाद कर रहा है।

2 लाख के बजाय 50 हजार का जुर्माना

खंडपीठ ने कहा कि यह मामला 2 लाख रुपये के हर्जाने के साथ खारिज किए जाने योग्य है। हालांकि याचिकाकर्ता के वकील द्वारा बार-बार बिना शर्त माफी मांगे जाने को देखते हुए कोर्ट ने जुर्माने की राशि घटाकर 50 हजार रुपये कर दी।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह राशि हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा की जाएगी और बाद में इसे शासकीय विशिष्ट दत्तक ग्रहण अभिकरण, गरियाबंद को भेजा जाएगा। याचिकाकर्ता को एक महीने के भीतर यह राशि जमा करनी होगी, अन्यथा इसे भू-राजस्व की बकाया राशि की तरह वसूला जाएगा।

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