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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 67 सब-इंजीनियरों की नियुक्ति रद्द, भर्ती नियमों में बाद में बदलाव को बताया अवैध

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में वर्ष 2011 में नियुक्त 67 सब-इंजीनियर (सिविल) की नियुक्तियों को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है।

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Harsh Verma
Bilaspur High Court

CG Sub Engineer Recruitment 2011: छत्तीसगढ़ में सरकारी भर्तियों को लेकर एक अहम और दूरगामी असर वाला फैसला सामने आया है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में वर्ष 2011 में नियुक्त किए गए 67 सब-इंजीनियर (सिविल) की नियुक्तियों को अवैध मानते हुए निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियमों और योग्यता के मापदंडों में बदलाव नहीं किया जा सकता। यह फैसला चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनाया।

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योग्यता की कट-ऑफ तिथि पर सख्त रुख

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि यदि किसी भर्ती विज्ञापन में शैक्षणिक योग्यता के लिए अंतिम तिथि तय की गई है, तो उसी तारीख तक अभ्यर्थी के पास आवश्यक डिग्री या डिप्लोमा होना अनिवार्य है। चयन की तारीख या बाद के निर्णयों को आधार नहीं बनाया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि “बैकडोर से आई नियुक्तियों को उसी रास्ते लौटना होगा”, यानी नियमों को दरकिनार कर दी गई भर्तियां लंबे समय तक टिक नहीं सकतीं।

क्या है पूरा मामला

2011 में ग्रामीण अभियांत्रिकी सेवा के तहत सब-इंजीनियर के 275 पदों के लिए विज्ञापन जारी हुआ था।

दरअसल, वर्ष 2011 में ग्रामीण अभियांत्रिकी सेवा के तहत सब-इंजीनियर (सिविल) के 275 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। आरोप है कि विभाग ने विज्ञापन की शर्तों का उल्लंघन करते हुए 275 पदों के बजाय 383 नियुक्तियां कर दीं।

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जांच में यह भी सामने आया कि इनमें से 89 ऐसे अभ्यर्थी थे, जिनके पास आवेदन की अंतिम तिथि 23 मार्च 2011 तक आवश्यक डिग्री या डिप्लोमा नहीं था। बाद में इन्हीं नियुक्तियों को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

याचिका और अदालत तक पहुंचा मामला

इस भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देते हुए रवि तिवारी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। पहले सिंगल बेंच ने याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद सिंगल बेंच के आदेश के खिलाफ डिवीजन बेंच में अपील दायर की गई, जिस पर अब यह फैसला आया है।

शासन की दलीलें और कोर्ट की सख्ती

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने दलील दी कि विभाग ने बाद में अंतिम सेमेस्टर में पढ़ रहे अभ्यर्थियों को मौका देने का निर्णय लिया था। यह भी कहा गया कि संबंधित कर्मचारी पिछले 14 वर्षों से सेवा दे रहे हैं और उनकी सेवाएं पुष्टि भी हो चुकी हैं।

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हालांकि हाईकोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि लंबी सेवा अवधि किसी अवैध नियुक्ति को वैध नहीं बना सकती।

दो को राहत, बाकी नियुक्तियां रद्द

डिवीजन बेंच ने रिट ऑफ को-वारंटो जारी करते हुए निजी प्रतिवादी क्रमांक 4 से 73 तक की नियुक्तियां रद्द कर दीं। हालांकि प्रतिवादी क्रमांक 55 वर्षा दुबे और 64 अभिषेक भारद्वाज को राहत दी गई, क्योंकि उन्होंने कट-ऑफ तिथि से पहले आवश्यक शैक्षणिक योग्यता पूरी कर ली थी।

कोर्ट ने मानवीय आधार पर यह आदेश भी दिया कि लगभग 14 साल तक सेवा दे चुके इन कर्मचारियों से अब तक दिए गए वेतन और भत्तों की वसूली नहीं की जाएगी। लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि नियुक्तियां पूरी तरह अवैध थीं।

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राज्य सरकार की चूक पर तीखी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की गंभीर चूक पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि चयन प्रक्रिया में अनावश्यक देरी और नियमों की अनदेखी के कारण कई अभ्यर्थी अब उस उम्र में पहुंच गए हैं, जहां उनके पास दूसरी सरकारी नौकरी के सीमित अवसर ही बचे हैं।

भर्ती गड़बड़ी पर पहले भी हो चुकी थी FIR

इस भर्ती से जुड़ा मामला पहले भी जांच के दायरे में आ चुका है। वर्ष 2022 में रायपुर के सिविल लाइंस थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोप था कि तय पदों से ज्यादा नियुक्तियां की गईं और कई अभ्यर्थियों को कट-ऑफ तिथि के बाद योग्य माना गया। जांच के दौरान 89 में से 19 अभ्यर्थी पहले ही अपने पद छोड़ चुके थे।

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