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महाभारत के युद्ध में कौन और कैसे बनाता था लाखों सैनिकों का भोजन?

महाभारत के युद्ध में कौन और कैसे बनाता था लाखों सैनिकों का भोजन? who and how used to prepare food for lakhs of soldiers in the war of mahabharata vkj

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deepak
महाभारत के युद्ध में कौन और कैसे बनाता था लाखों सैनिकों का भोजन?

Mahabharata War : महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से ग्यारह अक्षुणी सेना और पांडवों की ओर से सात अक्षुणी सेनाओं ने भाग लिया था। यानि इस युद्ध में सभी महारथियों और सेनाओं को मिलाकर करीब 50 लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया था। लेकिन यहां अब सवाल ये उठता है कि इतनी विशालकाय सेना के लिए युद्ध के दौरान भोजन कौन बनाता था? और कैसे ये सब प्रबंध करता था? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हर दिन हजारों लोग मारे जाते थे तो शाम को किस हिसाब से खाना बनता था। आइए जानते है...

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महाभारत का युद्ध प्रथम विश्व युद्ध!

महाभारत को हम सही मायने में विश्व का प्रथम विश्व युद्ध भी कह सकते है। क्योंकि उस समय शायद ही ऐसा कोई राज्य था जिसने इस युद्ध में भाग लिया हो। उस काल में आर्यवर्त के समस्त राजा या कौरव अथवा पांडव के पक्ष में खड़े दिख रहे थे। हम सभी जानते है की श्री बलराम और रूकमी ये दो ही व्यक्ति ऐसे थे, जिन्होंने इस युद्ध में भाग नहीं लिया था। किन्तु एक और राज्य ऐसा था जो युद्ध क्षेत्र में होते-होते ही युद्ध से विरक था और वो राज्य था दक्षिण का उडीपी राज्य

राजा ने कृष्ण से किया था निवेदन

महाभारत (Mahabharata War) में वर्णीत कथा के अनुसार जब इस राज्य के राजा अपनी सेना के साथ कुरूक्षेत्र पहुंचे तो कौरव और पांडव दोनों ने उन्हें अपने अपने पक्ष में लेने प्रयत्न करने लगे। लेकिन उडीपी के राजा बहुत दूरर्शी थे। उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा हे माधव दोनों ओर से जिसे देखों युद्ध के लिए आतुर दिखता है, किन्तु क्या किसी ने सोचा है कि दोनो ओर से उपस्थित इतनी विशाल सेना के भोजन का प्रबंध कैसे होगा। इस पर भगवान श्री कृष्ण ने कहा महाराज आपने विल्कुल सही सोचा हैं। आपकी इस बात से मुझे प्रतित होता है कि आपके पास इसकी कोई योजना है। अगर ऐसा है तो कृप्या बताएं। उसके बाद उड़ीपी नरेश ने कहा कि सत्य तो यह है कि भाईयों के बीच हो रहे इस युद्ध को मैं उचित नहीं मानता। इसी कारण इस युद्ध में भाग लेने की इच्छा मुझे नहीं है। किन्तु ये युद्ध अब टाला भी नहीं जा सकता। इस कारण मेरी यही इच्छा है कि में अपनी पूरी सेना के साथ यहां उपस्थित होकर समस्त सेना के लिए भोजन का प्रबंध करू। राजा की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा आपका विचार उत्तम है। इस युद्ध में लगभग 50 लाख योद्धा भाग लेंगे और अगर आप जैसा कुशल राजा उनके भोजन का प्रबंध देखेगा तो हम सभी उस ओर से बेफिक्र रहेंगे। वैसे भी मुझे पता है कि सागर जैसे विशाल सेना के लिए भोजन प्रबंध करना आपके और भीमसेन के अतिरिक्त और किसी में भी संभव नहीं है। किंतु भीमसेन इस युद्ध से विरक्त नहीं हो सकते। इसलिए मेरी आपसे प्रार्थना है की आप अपनी सेना सहित दोनों ओर की सेनाओं के भोजन का भार संभालिए।

राजा ने संभाली थी भोजन की कमान

इसके बाद उडीपी के राजा ने सेना के भोजन का भार संभाला। पहले दिन उन्होंने उपस्थित सभी युद्धाओं के लिए भोजन का प्रबंध किया। उनकी कुशलता ऐसी थी कि दिन के अंत तक एक दाना भी अन्न का बर्वाद नहीं होता था। जैसे-जैसे दिन निकलते गए योद्धओं की संख्या भी कम होती गई। दोनों ओर के योद्धा ये देखकर हैरान रह जाते थे। हर दिन के अंत तक उडीपी नरेश केवल उतने लोगों का भोजन बनवाते थे, जितने वास्तव में उपस्थित रहते थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था की आखिर उन्हें यह कैसे पता चल जाता है कि आज कितने योद्धा मृत्यू को प्राप्त होंगे। ताकि उस आधार पर भोजन की व्यवस्था करवा सके। इतनी विशाल सेना के लिए भोजन का प्रबंध करना आपने आप में ही एक आश्चर्य था और उस पर भी इस प्रकार की अन्न का एक दाना भी बर्वाद ना हो। जो एक किसी चमत्कार से कम नहीं था। आखिरकार जब 18वें दिन युद्ध समाप्त हुआ और पांडवों की जीत हुई। अपने राज्य अभिषेक के दिन आखिरकार युधिष्टर ने उडीपी राजा से पूछ ही लिया की समस्त देशों के राजा हमारी प्रशंसा कर रहे है, की किस प्रकार हमने कम सेना होते हुए भी हमने उस सेना को परास्त कर दिया जिसका नेतृत्व पितामहा, भीष्म, गुरू द्रोण और हमारे भ्राता जैसे महारथी कर रहे थे। लेकिन मुझे लगता है कि सबसे अधिक प्रसंशा के पात्र आप हैं, जिन्होंने न केवल इतनी विशाल सेना के लिए भोजन का प्रबंध किया। बल्कि ऐसा प्रबंध किया कि एक दाना भी अन्न का व्यर्थ नहीं गया। में आपसे इसका रहस्य जानना चाहता हूं।

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उडीपी राजा ने बताया रहस्य

अपने जबाव में उडीपी नरेश ने कहा कि सम्राट आपने जो इस युद्ध में विजय पाई है, उसका श्रय किसे देंगे। इस पर सम्राट ने कहा श्रीकृष्ण के अतिरिक्त इसका श्रय और किसी को दिया ही नहीं जा सकता है। अगर वह नहीं होते तो कौरव सेना को हराना असंभव था। तब उडीपी राजा ने कहा कि महाराज आप जिसे मेरा चमत्कार कह रहे है वो भी श्री कृष्ण का ही प्रताप है। ऐसा सुनकर वहां उपस्थित सभी लोग हैरान हो गए। तब उडीपी राजा ने इस रहस्य से पर्दा उठाया और बताया कि श्री कृष्ण प्रतिदिन रात्री को मुंगफली खाते थे। में प्रतिदिन उनके शिविर में गिनकर मूंगफली रखता था। और उनके खाने के बाद गिनकर देखता था की उन्होंने कितनी मूंगफली खाई है। वे जितनी मुंगफली खाते थे, उसके ठीक हजार गुना सैनिक अगले युद्ध में मारे जाते थे। यदि वे 50 मूंगफली खाते थे तो मैं समझ जाता था की अगले दिन 50 हजार सैनिक युद्ध में मारे जाएंगे। उसी के अनुसार में अगले दिन भोजन कम बनाता था। यही कारण था युद्ध के दौरान कभी भोजन व्यर्थ नहीं गया। भगवान श्री कृष्ण के चमत्कार को सुनकर सभी उनके आगे नतमस्तक हो गए।

यह कथा महाभारत (Mahabharata War) के सबसे दुलर्भ कथाओं में से एक है। कर्नाटक के उडीपी जिले में स्थित कृष्णमठ में ये कथा हमेशा सुनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस मठ की स्थापना उडीपी के सम्राट द्वारा ही करवाई गई थी। जिसे बाद में श्री माधव आचार्य ने आगे बढ़ाया।

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