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Ratlam School Incident: स्कूल में मोबाइल फोन लेकर पहुंचा 8वीं क्लास का छात्र, प्रिंसिपल ने पेरेंट्स को बुलाया तो तीसरी मंजिल से कूदा

Ratlam School Incident: रतलाम से शुक्रवार सुबह एक दर्दनाक घटना सामने आई, जब बोधि इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ने वाले कक्षा 8 के एक छात्र ने तीसरी मंजिल से कूदकर अपनी जान देने की कोशिश की।

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anjali pandey
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Ratlam School Incident: जमाना बदल रहा है.. ये कहना गलत नहीं होगा! जहां पहले माता पिता के आंख दिखाने तक से बच्चे कांप जाते थे वहीं, अब वही बच्चों को अगर कुछ कह दो तो वह ऐसा कदम उठा लेते हैं जिसके बारे ने सोचना ही संभव नहीं है। दरअसल एक ऐसा ही मामला रतलाम से सामने आया है। जहां से शुक्रवार सुबह बोधि इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ने वाले कक्षा 8 के एक छात्र ने तीसरी मंजिल से कूदकर अपनी जान देने की कोशिश की।

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क्या है मामला 

घटना लगभग सुबह 10 बजे की है। छात्र आसाराम बापू नगर का रहने वाला है। जानकारी के मुताबिक, छात्र स्कूल में मोबाइल फोन लेकर आया था, जिसे स्टाफ ने देख लिया। इसके बाद मामला प्रिंसिपल तक पहुंचा और छात्र को समझाने के लिए उनके कमरे में बुलाया गया था। इस दौरान बच्चे के परिजन को भी बुलाया। बातचीत के दौरान अचानक वह वहां से भागा और सीधे तीसरी मंजिल पर जाकर छलांग लगा दी।

छुटकारा खोजने की उसकी यह कोशिश उसे गंभीर रूप से घायल कर गई। तुरंत स्कूल स्टाफ ने उसे अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टर इलाज में जुटे हैं।

दोनों पैरों में फ्रैक्चर

बताया जा रहा है कि, हादसे में उसके दोनों पैरों में फ्रैक्चर हुए हैं। सिर और चेहरे पर भी गंभीर चोटें आई हैं। पहले उसे नजदीकी निजी अस्पताल ले जाया गया, वहां प्राथमिक उपचार के बाद उसे 80 फीट रोड स्थित दूसरे निजी अस्पताल में भर्ती किया गया। यहाँ उसकी एमआरआई और अन्य मेडिकल जांचें जारी हैं। घटना की जानकारी मिलते ही औद्योगिक क्षेत्र थाना पुलिस और परिवार के परिचित डॉक्टर भी अस्पताल पहुंच गए। 

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मां ने कहा बेटा स्केटिंग खिलाड़ी है

छात्र की मां का कहना है कि उनका बेटा एक स्केटिंग प्लेयर है। सुबह स्कूल से फोन आया।  वह ड्यूटी के लिए तैयार हो रही थीं, तभी उनके पति का फोन आया कि तुरंत अस्पताल पहुंचें। उन्होंने बताया कि स्कूल से कॉल तो आया, लेकिन घटना कैसे हुई, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई। हादसे के समय उनके पति स्कूल में ही मौजूद थे।

पिता बोले- स्कूल गया तो पता चला कि बेटा कूद गया

छात्र के पिता ने कहा कि बेटा लगातार स्कूल जा रहा था। जब वे स्कूल पहुंचे तो वहां उन्हें बताया गया कि बच्चा बिल्डिंग से कूद गया है। स्कूल स्टाफ मौके पर आया और उनकी ही कार से छात्र को अस्पताल ले जाया गया। हालांकि पिता अभी भी यह स्पष्ट नहीं बता पा रहे कि उन्हें स्कूल किस वजह से बुलाया गया था। उन्होंने कहा कि वे अब स्कूल प्रबंधन से पूरी जानकारी लेकर बात करेंगे।

जानें इस बारे में बंसल हॉस्पिटल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी का क्या कहना है

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FAQ

बच्चे मोबाइल फोन को लेकर बहुत ज़िद करते हैं, उन्हें कैसे समझाएं?
बच्चों की मोबाइल ज़िद को संभालने के लिए पहले कारण समझें क्या वे गेम चाहते हैं, सोशल मीडिया या पढ़ाई? मोबाइल को इनाम की तरह इस्तेमाल न करें। मोबाइल की जगह अन्य गतिविधियाँ दें स्पोर्ट्स, क्रिएटिव वर्क, आउटडोर गेम। घर में नो मोबाइल ज़ोन तय करें। उनके सामने खुद भी मोबाइल उपयोग सीमित रखें बच्चे नकल से सीखते हैं।
बच्चों में ‘ना’ को समझने की आदत कैसे डालें?
बच्चों को शुरू से हर बात पर हां नहीं कहनी चाहिए। अगर बच्चा किसी चीज़ की ज़िद करता है, तो कभी-कभी “ना” कहना ज़रूरी है। इससे बच्चे को समझ आता है कि हर इच्छा तुरंत पूरी नहीं होती। यह आदत आगे चलकर उन्हें छोटे-छोटे तनावों को संभालने में मदद करती है और वे भावनात्मक रूप से मजबूत बनते हैं।
बच्चों को तनाव या प्रेशर को संभालना कैसे सिखाएं?
बच्चों को एकदम बड़े तनाव से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे चैलेंज देकर ट्रेंड करना चाहिए। जैसे खुद अपना बैग तैयार करना, होमवर्क समय पर पूरा करना, छोटे कामों की ज़िम्मेदारी देना। ऐसे छोटे कार्य बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ाते हैं और वे परिस्थिति बिगड़ने पर घबराने के बजाय समाधान ढूँढना सीखते हैं।
बच्चा अकेले होने पर तनाव का सामना कैसे कर सके, इसके लिए माता-पिता क्या करें?
बच्चे को छोटी-छोटी परिस्थितियों में खुद निर्णय लेने दें। उसे सिखाएं कि डर या परेशानी होने पर गहरी सांस लेकर शांत रहना है। बच्चा समस्या बताए तो तुरंत समाधान देने के बजाय उससे पूछें “तुम्हें क्या लगता है, इसे कैसे ठीक किया जा सकता है? इससे बच्चा मानसिक रूप से मज़बूत बनता है।
सिंगल पेरेंट्स बच्चों में तनाव सहने की क्षमता कैसे बढ़ाएं?
सिंगल पेरेंटिंग में चुनौतियां अधिक होती हैं, इसलिए बच्चे से खुलकर बातचीत करें। दिन में 10–15 मिनट केवल “क्वालिटी टाइम” दें। बच्चे पर अधिक सहारा न बनें, वरना वह मानसिक रूप से निर्भर हो जाता है गलत–सही का अंतर शांतिपूर्वक समझाएँ। बच्चों को जीवन की छोटी-छोटी ट्रेनिंग दें जिम्मेदारी, अनुशासन, समय प्रबंधन।
मोबाइल का उपयोग कम कैसे करवाएं
मोबाइल का “फिक्स टाइम” बनाएं। बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम रूल्स तय करें। फोन को पढ़ाई और एंटरटेनमेंट के लिए अलग-अलग उपयोग करवाएं। पढ़ाई वाले ऐप या वीडियो केवल पैरेंटल कंट्रोल में चलाएं। ऑफलाइन गतिविधियों ड्रॉइंग, आउटडोर गेम्स, पज़ल्स को बढ़ावा दें।
बच्चों को अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर लाना क्यों ज़रूरी है?
जब बच्चा हर समय अपनी मर्जी के मुताबिक चीज़ें पाता है, तो कठिन परिस्थिति आते ही वह टूट जाता है। इसलिए नई गतिविधियाँ करवाएँ, ग्रुप में खेलने भेजें, छोटे-छोटे घरेलू काम दें। ये सब चीज़ें मानसिक लचीलापन (Mental Flexibility) बढ़ाती हैं।
क्या छोटे बच्चों पर हल्का दबाव डालना सही है?
हल्का, नियंत्रित और सकारात्मक दबाव बच्चों को ज़िम्मेदारी सिखाता है। यह दबाव सज़ा नहीं, बल्कि सीख की तरह होना चाहिए। जैसे अपना सामान खुद संभालना, समय पर सोना–जागना, तय समय पर पढ़ाई करना यह बच्चों को Life Discipline सिखाता है।

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