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Supreme Court Hearing Update: सुप्रीम कोर्ट में आज यानी बुधवार 7 जनवरी को आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों पर सुनवाई हुई। इस दौरान जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की विशेष पीठ ने कहा कि यह मुद्दा सिर्फ कानून या फिर पशु प्रेम तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर लोगों की सुरक्षा और जीवन से जुड़ा हुआ है। कोर्ट ने टिप्पणी की आज हम सभी की बात सुनेंगे पीड़ितों की, कुत्तों से नफरत करने वालों की और उनसे प्यार करने वालों की भी।
आज यानी बुधवार को मामले की सुनवाई ढाई घंटे तक चली। अब अगली सुनवाई कल यानी 8 जनवरी को सुबह 10.30 बजे से फिर शुरू होगी।
आप खुशकिस्मत हैं, लोग मर रहे हैं!
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि जब भी वे मंदिरों या फिर किसी सार्वजनिक स्थानों पर जाते हैं तो उन्हें कभी किसी जानवर ने नहीं काटा। इस पर कोर्ट ने तुरंत तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा 'आप खुशकिस्मत हैं। लेकिन हकीकत यह है कि बच्चों को काटा जा रहा है, बड़ों को भी काटा जा रहा है। जिससे लोग जान गंवा रहे हैं।
जस्टिस विक्रम नाथ ने आगे कहा कि मामला सिर्फ काटने तक सीमित नहीं है। 'कुत्तों से दुर्घटनाओं का भी खतरा है। आप यह कैसे पहचान करेंगे कि सुबह-सुबह कौन सा कुत्ता किस मूड में है?'
गेटेड कम्युनिटी में कुत्ते रहें या नहीं?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गेटेड कम्युनिटी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि किसी क्लोज कैंपस में कुत्ता रखना है या नहीं, यह वहां रहने वालों का विवेक होना चाहिए। इसके आगे उन्होंने कहा 90% लोग मानते हैं कि आवारा कुत्ते खतरनाक हैं वहीं 10% लोग ऐसे भी हैं तो उनके पक्ष में हैं, तो फैसला लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए। कोई यह कहकर भैंस भी ला सकता है कि वह पशु प्रेमी है, लेकिन इससे दूसरों को परेशानी होगी।
अब बस कुत्तों की काउंसलिंग बाकी
इसके आगे कपिल सिब्बल ने समाधान के तौर पर कहा कि अगर कोई आक्रामक कुत्ता है तो उसे पकड़कर नसबंदी की जाए। इसके बाद उसे उसी इलाके में वापस छोड़ा जाए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हल्के व्यंग्य में कहा अब बस एक ही चीज बाकी है कुत्तों की काउंसलिंग, ताकि वे वापस आकर काटें नहीं। हालांकि कोर्ट ने साफ किया कि यह टिप्पणी हल्के अंदाज में थी, लेकिन चिंता बेहद गंभीर है।
पीड़ितों की दर्द भरी दलील
एक पीड़ित याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि, उसकी बेटी को 7–8 आवारा कुत्तों ने हमला कर बुरी तरह काट लिया था। अब हालात ऐसे हैं कि वह घर से बाहर निकलने से डरती है। पीड़ितों ने मांग की कि हाउसिंग सोसाइटियों और गेटेड कम्युनिटी से आवारा कुत्तों को हटाने का अधिकार RWA को दिया जाना चाहिए।
कोर्ट की साफ चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा रोकथाम इलाज से बेहतर है। सड़कों को कुत्तों से खाली रखना होगा। वे सिर्फ काटते ही नहीं, बल्कि सड़क हादसों की भी वजह बनते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालत परिसरों, स्कूलों और संस्थानों में कुत्तों की मौजूदगी का कोई औचित्य नहीं है।
केस की टाइमलाइन
बता दें कि, यह मामला 28 जुलाई 2025 को सामने आया था, जब दिल्ली में डॉग बाइट से रेबीज से हो रही मौतों पर एक मीडिया रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। अब तक इस केस में कई अहम आदेश और टिप्पणियां आ चुकी हैं। जिसमें नसबंदी और वैक्सीनेशन पर जोर, आक्रामक कुत्तों को अलग रखने के निर्देश और राज्यों और नगर निगमों की लापरवाही पर सख्त नाराजगी।
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