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इस समुदाय के लोगों के शरीर पर कण-कण में बसे हैं राम, काफी दिलचस्प है इनका इतिहास

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Bansal Digital Desk
इस समुदाय के लोगों के शरीर पर कण-कण में बसे हैं राम, काफी दिलचस्प है इनका इतिहास

नई दिल्ली। प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या में एक ऐसा अनोखा बैंक है जो देश और दुनिया में बेहद ही चर्चित है। यहां रूपया-पैसा जमा नहीं होता, बल्कि यहां लोग सिर्फ राम नाम की लिखी हुई कापियां जमा कराते हैं। देशभर में सीताराम बैंक की कुल 124 शाखाएं हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में एक ऐसा भी राज्य हैं जहां के एक समुदाय ने राम को अपने शरीर के हर हिस्से में धारण किया है?

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छत्तीसगढ़ का रामनामी समंप्रदाय

कहते हैं कि हमारे रोम-रोम में राम रमें हैं। लेकिन वास्तव में छत्तीसगढ़ के रामनामी समंप्रदाय के लोग इस वाक्य को चरितार्थ करते हैं। जनके लिए राम-राम और राम का नाम उनकी संस्कृति और उनकी परंपरा और आदत का हिस्सा है। इस समुदाय के कण-कण में राम बसे हैं। राम का नाम इनके जीवन में हर समय गुंजायमान है। इस समाज के लोग अपने शरीर पर राम के नाम को बसा कर रखते हैं। यानी राम नाम की टैटू गूदवाते हैं। यहीं नहीं इनके घरों की दिवारों और शरीर पर ओढने वाली चादर पर भी राम का ही नाम होता है।

ऐसे हुई इस परंपरा की शुरूआत

भारत में लंबे समय तक दलितों को छोटी जात कहकर मंदिरों में प्रवेश से मना कर दिया जाता था। इतना ही नहीं इन्हें पानी के लिए सामूहिक कुओं का उपयोग करने से भी मना कर दिया जाता था। छत्तीसगढ़ के रामनामी समंप्रदाय के लोगों के साथ भी कुछ ऐसा ही होता था। इस तिरस्कार को देखते हुए समंप्रदाय के लोगों ने मंदिर और मुर्ति दोनों को त्याग कर भगवान राम को ही अपने कण-कण में बसा लिया।

इस परंपरा को 20 पीढ़ी से लोग निभा रहे हैं

इस समाज के लोग अपनी इस परंपरा को लगभग 20 पीढ़ी से निभाते आ रहे हैं। आज उनके शरीर पर राम के नाम का बना टैटू उनकी पहचान बन गया है। इस समाज के लोग संत दादू दयाल को अपना मूल पुरूष मानते हैं। रामनामी समाज के लोग सिर्फ राम का नाम ही शरीर पर नहीं गुदवाते बल्कि अहिंसा के रास्ते पर भी चलते हैं। ये न तो झूठ बोलते हैं और न ही मांस खाते हैं।

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नयी पीढ़ी के लोग प्रथा को छोड़ भी रहे हैं

इस समाज में पैदा हुए लोगों के लिए शरीर के कुछ हिस्सों में टैटू बनवावा जरूरी है। परंपरा के अनुसार 2 साल की उम्र होने तक बच्चों की छाती पर राम नाम का टैटू बना दिया जाता है। हालांकि समुदाय की नयी पीढ़ी के कुछ लोग गोदना से होने वाले दर्द की वजह से इस प्रथा को छोड़ भी रहे हैं। वहीं कुछ लोग नौकरी करने के कारण भी टैटू नहीं बनवाते हैं।

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