मध्यप्रदेश के एक बुजुर्ग का दावा: 50 सालों से नींद नहीं आई, क्या हैं सोने को लेकर गलत धारणा, आखिर क्या है सच्चाई

रीवा के एक बुजुर्ग ने दावा किया कि पिछले 50 सालों से उन्हें नींद ही नहीं आई। सीनियर साइकेट्रिस्ट और अवसाद,अनिद्रा रोग विशेषज्ञ डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने बताया कि क्या वाकई ऐसा हो सकता है या नहीं।

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हाल ही में मीडिया में यह खबर पढ़ने को मिली कि रीवा के एक बुजुर्ग व्यक्ति ने यह दावा किया है कि उन्हें पिछले कई दशकों से नींद नहीं आई है। यह समाचार पढ़ते ही स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा होती है, लेकिन उससे भी अधिक एक चिकित्सकीय चिंता पैदा होती है। मैं नींद और मानसिक रोगों का इलाज करने वाला चिकित्सक हूं, इसलिए मुझे लगा कि इस विषय पर चुप रहना ठीक नहीं होगा। ऐसे दावे केवल चौंकाने वाली खबर नहीं होते, बल्कि समाज में नींद को लेकर फैली गलत धारणाओं को भी उजागर करते हैं। एक चिकित्सक के रूप में यह मेरी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि इस विषय पर सही जानकारी आम लोगों तक पहुंचे।

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रीवा के मोहनलाल द्विवेदी का दावा कि वे 50 साल से नहीं सोए

50 सालों तक सो नहीं पाना जैविक रूप से असंभव

अस्पतालों में अक्सर कुछ लोग यह कहते हुए मिल जाते हैं कि वे पिछले 20, 30 या 50 वर्षों से सोए ही नहीं हैं। ऐसे कथन को न तो मजाक में लेना चाहिए और न ही बिना जांच के सच मान लेना चाहिए। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो कोई भी व्यक्ति 50 वर्षों तक बिल्कुल नहीं सोया हो, यह जैविक रूप से असंभव है।

लंबे समय तक नींद को रोका नहीं जा सकता

नींद मनुष्य की बुनियादी शारीरिक आवश्यकता है, ठीक उसी तरह जैसे भोजन, पानी और सांस लेना। हमारा मस्तिष्क अपने आप यह व्यवस्था करता है कि शरीर को नींद मिले। चाहे व्यक्ति कितनी भी कोशिश करे, लंबे समय तक नींद को रोका नहीं जा सकता। वैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि कोई व्यक्ति कुछ ही दिनों तक लगातार जाग सकता है। इसके बाद भ्रम होने लगता है, चीजें दिखाई देने लगती हैं, सोचने और निर्णय लेने की क्षमता घट जाती है और गंभीर मानसिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं। इसलिए दशकों तक बिना सोए रहना संभव नहीं है।

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ऐसा महसूस होने की वजह क्या है ?

तो फिर लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि उन्हें वर्षों से नींद नहीं आई ? इसका कारण वास्तव में नींद का पूरी तरह न होना नहीं, बल्कि नींद को महसूस न कर पाना होता है। कई लोग सोते तो हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि वे जागते रहे। उनकी नींद हल्की होती है, बार-बार टूटती है और गहरी नींद का अनुभव नहीं हो पाता। इसी कारण उन्हें यह विश्वास हो जाता है कि उन्हें नींद आती ही नहीं।

सही मूल्यांकन होना चाहिए

यह समस्या अक्सर अवसाद, चिंता, अत्यधिक बेचैनी, मानसिक उत्तेजना की अवस्थाओं, अन्य मानसिक रोगों या लंबे समय तक नशे के सेवन से जुड़ी होती है। कुछ मामलों में यह विश्वास इतना मजबूत हो जाता है कि व्यक्ति जांच और समझाने के बाद भी यह मानने को तैयार नहीं होता कि वह सोता है। चिकित्सकीय दृष्टि से ऐसे मामलों में न तो मरीज की बात को सीधे खारिज किया जाना चाहिए और न ही बिना जांच उसे पूरी तरह सही मान लेना चाहिए। सही तरीका यह है कि नींद से जुड़ी पूरी जानकारी ली जाए। कुछ समय तक नींद का रिकॉर्ड रखा जाए और मानसिक स्थिति का समुचित मूल्यांकन किया जाए।

50 वर्षों से नींद नहीं आई, ये सच्चाई नहीं बल्कि मानसिक अनुभव

अंत में यही कहना उचित होगा कि '50 वर्षों से नींद नहीं आई' कोई शारीरिक सच्चाई नहीं, बल्कि एक मानसिक अनुभव है। मरीज को यह समझाना उपचार का सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है कि उसका शरीर सो रहा है, लेकिन उसका मन उस नींद को पहचान नहीं पा रहा। जब यह भ्रम धीरे-धीरे दूर होता है, तभी इलाज सही दिशा में आगे बढ़ पाता है।

( लेखक सीनियर साइकेट्रिस्ट और अवसाद, अनिद्रा रोग विशेषज्ञ हैं )

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