/bansal-news/media/media_files/2026/02/19/shivaji-jayanti-2026-water-management-system-dr-lokendra-singh-hindi-news-2026-02-19-18-35-50.jpg)
Shivaji Jayanti 2026: सह्याद्रि के उत्तुंग शिखरों पर आसमान से बातें करने वाले गिरिदुर्ग हों या फिर समुद्री लहरों के बीच मुस्कुराते जलदुर्ग, उनकी व्यवस्थाएं देखकर ध्यान आता है कि हिन्दवी स्वराज्य के योजनाकार, वास्तुकार, अभियंता और निर्माण में योगदान करने वाले सभी शिल्पकार एवं श्रमिक अपने कार्य-कौशल में सिद्धस्थ थे। सुरक्षा पक्ष हो या फिर कला पक्ष, सबका बारीकी से विचार किया गया। इसके साथ ही बुनियादी आवश्यकताओं की चिंता भी की गई।
12 महीने पानी की व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती
भारत में जहाँ भी आपने दुर्ग देखे होंगे, उनमें जलस्रोत की व्यवस्था देखी ही होगी। परंतु हिन्दवी स्वराज्य के किलों में जलस्रोतों का प्रबंधन रचनात्मक ढंग से किया गया है। हजारों फीट की ऊंचाई पर बारह महीने पानी की व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण था। कुशल योजनाकारों ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से दुर्गों पर जलाशयों का निर्माण किया है। किसी भी दुर्ग पर एक-दो नहीं अपितु अलग-अलग हिस्सों में कई जलाशयों का निर्माण किया जाता था। हम हिन्दवी स्वराज्य की राजधानी दुर्गदुर्गेश्वर श्रीरायगढ़ की ही बात करें, तो वहाँ छोटे-बड़े 84 जलाशयों का निर्माण किया गया है। चूँकि रायगढ़ पर अधिक संख्या में लोग रहते थे इसलिए यहाँ बड़ी संख्या में जल निकायों का निर्माण किया गया। श्रीरायगढ़ के प्रसिद्ध जल निकाय हैं- गंगा सागर तालाब, हत्ती तालाब, कुशावर्त तालाब, हनुमान टांकी, बारह टांकी इत्यादि।
वर्षा जल सहेजने के प्रबंध
/filters:format(webp)/bansal-news/media/media_files/2026/02/19/shivaji-maharaj-jayanti-2026-02-19-18-51-24.jpeg)
पहाड़ी क्षेत्रों में हजारों फीट की ऊंचाई बने दुर्गों पर पानी का प्रबंध कहाँ से किया जाए कि वर्षभर पशुओं और मनुष्यों का जीवन चलता रहे। यहाँ वर्षा जल के संग्रह से बेहतर उपाय कोई और हो नहीं सकता। इसलिए शिवाजी महाराज ने वर्षा जल को सहेजने के प्रबंध दुर्गों पर किए हैं। शिवाजी महाराज के निर्देश थे कि किला बनाना शुरू करने से पहले अच्छी तरह देख लिया जाए कि पानी की व्यवस्था कैसे होगी ? पानी आसानी से उपलब्ध न हो और फिर भी उसी जगह किला बनाना जरूरी हो, तो पत्थर फोड़कर तली में मजबूत टंकी बनाई जाए, जो इतनी विशाल हो कि वहाँ बारिश के दिनों में संग्रहित पानी सालभर काम आए। एक ही टंकी से संतुष्ट न हों, क्योंकि युद्ध के समय तोपें चलती हैं और उस वक्त उनकी आवाज से बचने के लिए काफी पानी खर्च होता है। इसलिए पानी का बहुत जतन किया जाए।
पानी छनकर आए इसकी भी व्यवस्था
बारिश का पानी बहकर व्यर्थ न चला जाए इसलिए हिन्दवी स्वराज्य के गिरी दुर्गों में ढलान वाले क्षेत्रों में बांध बनाकर छोटे-बड़े तालाबों का निर्माण किया और वर्षा जल को इनमें सहेजने की व्यवस्था की। जल में कचरा बहकर न मिले, इसका भी प्रबंध किया जाता था। कुशावर्त तालाब में उसके अवशेष दिखायी देते हैं। पहाड़ से बहकर आने वाला पानी अपने साथ मिट्टी, पेड़ों से गिरे फूल-पत्ते और अन्य कचरा लेकर आएगा, यदि यह पानी सीधे तालाब में गिरेगा तब तालाब में पानी कम गाद अधिक इकट्ठी हो जाएगी। पानी छनकर तालाब में पहुँचे इसके लिए तालाब का जो परकोटा बनाया गया है, उसमें जालीदार पत्थर लगाए गए हैं। इसके अलावा कुशावर्त तालाब को दो हिस्सों में बाँटा गया है, एक हिस्से के पानी का उपयोग पेयजल के रूप में और दूसरे हिस्से के पानी का उपयोग अन्य कार्यों के लिए किया जाता था। तालाब में क्षमता से अधिक पानी एकत्र न हो, इसलिए पानी के निकासी की भी व्यवस्था यहां देखी जा सकती है। कुशावर्त तालाब में जब क्षमता से अधिक पानी एकत्र हो जाता था, तो वह गोमुख से होकर दुर्ग से नीचे पहुँच जाता था। यहाँ मिट्टी में दबा हुआ गोमुख अभी भी देखा जा सकता।
/filters:format(webp)/bansal-news/media/media_files/2026/02/19/shivaji-maharaj-water-management-system-2026-02-19-18-37-29.jpeg)
'एक पंथ दो काज' चरितार्थ
चारों ओर से पानी से घिरे जलदुर्ग में भी मीठे पानी का स्रोत होना चाहिए, इसका भी ध्यान रखा जाता था। समुद्र का खारा पानी तो प्यास नहीं बुझा सकता, इसलिए जलदुर्गों में रहनेवाली सेना और उनके घोड़ों एवं अन्य पशुओं के लिए मीठे पानी का प्रबंध करना आवश्यक हो जाता है। जलदुर्गों में भी एक से अधिक मीठे पानी के जलाशय तैयार किए जाते थे। हमने खांदेरी और कोलाबा दुर्ग में मीठे पानी के तालाब देखे थे। कोलाबा दुर्ग के पुष्करणी तालाब का तो वास्तु भी दर्शनीय है। किलों में पानी के निकायों/जलाशयों के निर्माण की पद्धति भी अनूठी और अनुकरणीय थी। दुर्ग में भवन एवं तटबंधी के लिए पत्थरों की आवश्यकता पड़ती थी। हजारों फीट ऊंचे पहाड़ों पर नीचे से पत्थर चढ़ाना हो या फिर समुद्र में जलदुर्ग बनाने के लिए पत्थरों की पूर्ति करना हो, सरल और सहज नहीं था। इसलिए योजनाकारों ने चातुर्य दिखाते हुए कहावत ‘एक पंथ दो काज’ को चरितार्थ किया। भवन इत्यादि निर्माण के लिए जहाँ से पत्थर निकाले जाते थे, उसे ही जलाशय के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता था। अर्थात कुछ तालाब अलग से नहीं खोदने पड़ते थे।
/filters:format(webp)/bansal-news/media/media_files/2026/02/19/shivaji-maharaj-water-management-2026-02-19-18-40-31.jpg)
बारिश मापने के लिए 'रेन गॉग मीटर'
राजधानी रायगढ़ पर जल प्रबंधन से जुड़ी एक और वैज्ञानिक संरचना देखने को मिलती है, जो बताती है कि हमारे पुरखे विज्ञान में कितने उन्नत थे। कितनी बारिश हुई है, इसे मापने के लिए ‘रेन गॉग मीटर’ नाम के यंत्र का उपयोग किया जाता है। इस यंत्र को खुले और ऊंचे स्थान पर लगाया जाता है। इसके साथ ही इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि आस-पास कोई पेड़ या ऊंची दीवार न हो। ताकि बारिश का पानी किसी वास्तु से टकराने के बजाय सीधे इस यंत्र में आकर गिरे, जिससे बारिश की मात्रा को सही तरह से मापा जा सके। हिन्दवी स्वराज्य की राजधानी में भी वर्षा को मापने की इसी तरह की व्यवस्था बनाई गई थी। रायगढ़ दुर्ग पर प्रधानमंत्री के आवास के समीप खुले स्थान पर एक छोटा-सा कक्षनुमा निर्माण है। इस संरचना में भीतर एक छोटा-सी टंकी है और छत में तीन छिद्र हैं, जिनमें से बारिश का पानी भीतर आता है और नीचे टंकी में एकत्र होता है। इस टैंक में जितना पानी एकत्र होता है, उसके आधार पर अनुमान लगा लिया जाता था कि समूचे हिन्दवी स्वराज्य में कितनी बारिश हुई है।
छत्रपति शिवाजी महाराज की सोच का अनुकरण करने की जरूरत
जल प्रबंधन को लेकर हिन्दवी स्वराज्य में इस स्तर की व्यवस्था थी। यह व्यवस्थाएं बताती हैं कि शिवाजी महाराज पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, जल प्रबंधन, तकनीक और विज्ञान को लेकर सजग थे। वर्षा जल के उपयोग की जैसी दृष्टि हिन्दवी स्वराज्य में दिखाई देती है, वैसी अन्यत्र कहीं नहीं है। जल प्रबंधन के विविध पक्षों पर गहन विचार करके छत्रपति शिवाजी महाराज ने आवश्यक व्यवस्थाएं खड़ी की थीं। जल प्रबंधन को लेकर महाराज की जो सोच थी, उसका अनुकरण आज भी करें, तो जल संकट को लेकर अनेक प्रकार की चुनौतियों से पार पा सकते हैं।
( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं और उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज के किलों पर केंद्रित पुस्तक 'हिन्दवी स्वराज्य दर्शन' लिखी है )
/bansal-news/media/agency_attachments/2025/12/01/2025-12-01t081847077z-new-bansal-logo-2025-12-01-13-48-47.png)
Follow Us