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JUSTICE DELAYED IS JUSTICE DENIED: नैतिक शुद्धता पर आधारित न्याय व्यवस्था जब बलात्कार से पीड़ित,सहमी और अंदर से टूटी हुई आत्मा की आवाज को सुनने से इंकार कर दे,तब महिलाओं को कहां जाना चाहिए। यह प्रश्न भारत और पाकिस्तान की करोड़ों महिलाओं को परेशान कर रहा है। दरअसल भारत और पाकिस्तान की अदालतों के हाल के समय में कुछ निर्णय हैरान करने वाले है और इससे महिला अस्मिता के लिए नई चुनौतियां सामने आ खड़ी हुई है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के रेप के एक केस में दिए गए फ़ैसले में जोर जबरदस्ती के बाद भी पूर्ण यौन सम्बन्ध स्थापित न होने की दशा में इसे बलात्कार नहीं बल्कि बलात्कार की कोशिश का अपराध कहा है। फ़ैसले में दर्ज़ घटना के विवरण के अनुसार अभियुक्त ने लड़की की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाएं,इसके बाद उसे कमरे में बंद कर दिया,हाथ पैर बांध दिए और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया। कोर्ट ने इस पर कहा की यह साक्ष्य बलात्कार के अपराध को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है,बल्कि इससे बलात्कार के प्रयास का अपराध बनता है। इस आधार पर कथित अपराधी की सजा को कम कर दिया गया। यह घटना 2004 की है। अर्थात् पीड़िता ने लंबे समय तक न्याय की आस में लड़ाई का साहस दिखाया। दो दशक से ज्यादा समय तक निचली अदालतों से होकर हाईकोर्ट तक पहुंची और जब फैसला आया तो अपमान और दर्द साथ लेकर आया। इस दौरान पीड़िता ने सामाजिक,आर्थिक और वैधानिक स्तर पर लाभ हानि की परवाह किए बिना खुद को सामने रखा,यह जज्बा भारत जैसे देश में अकल्पनीय माना जाता है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के रेप के एक केस में दिए गए फैसले में जोर जबरदस्ती के बाद भी पूर्ण यौन सम्बन्ध स्थापित न होने की दशा में इसे बलात्कार नहीं बल्कि बलात्कार की कोशिश का अपराध कहा है। फैसले में दर्ज घटना के विवरण के मुताबिक अभियुक्त ने लड़की की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाएं। इसके बाद उसे कमरे में बंद कर दिया। हाथ पैर बांध दिए और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया। कोर्ट ने इस पर कहा कि, यह साक्ष्य बलात्कार के अपराध को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। बल्कि इससे बलात्कार के प्रयास का अपराध बनता है। इस आधार पर कथित अपराधी की सजा को कम कर दिया गया। यह घटना 2004 की है। पीड़िता ने लंबे समय तक न्याय की आस में लड़ाई का साहस दिखाया। दो दशक से ज्यादा समय तक निचली अदालतों से होकर हाईकोर्ट तक पहुंची और जब फैसला आया तो अपमान और दर्द साथ लेकर आया। इस दौरान पीड़िता ने सामाजिक, आर्थिक और वैधानिक स्तर पर लाभ हानि की परवाह किए बिना खुद को सामने रखा,यह जज्बा भारत जैसे देश में अकल्पनीय माना जाता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर कड़ी टिप्पणी
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इसके पहले 2025 में इलाहाबाद कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि सर्वाइवर के स्तन को छूना और पायजामे की डोरी तोड़ने को बलात्कार या बलात्कार की कोशिश के मामले में नहीं गिना जा सकता है। हालांकि बाद में इस फैसले को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर कड़ी टिप्पणी करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने जस्टिस जॉयमाल्या बागची और एनवी अंजारिया के साथ कहा था कि यौन अपराधों के मामलों में फैसले के लिए कानूनी तर्क और सहानुभूति दोनों की जरूरत होती है।
ऐतिहासिक संदर्भ, हिरासत में बलात्कार का मामला
1972 में तुकाराम और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में, एक आदिवासी किशोरी पर आरोप लगाया गया था कि हिरासत में रहते हुए दो पुलिसकर्मियों ने उसके साथ बलात्कार किया था। जब मामला सत्र न्यायालय पहुंचा,तो न्यायाधीश ने पुलिसकर्मियों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित करने में विफल रहा है। न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि पुलिस स्टेशन में उसके साथ यौन संबंध हुआ था,लेकिन यौन संबंध और बलात्कार में बहुत बड़ा अंतर है। न्यायालय ने आगे कहा कि वह यौन संबंध की आदी थी और इसलिए उसकी सहमति स्वैच्छिक थी। जब अपील उच्च न्यायालय में गई,तो न्यायालय ने दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया और सजा सुनाई तथा इसे निष्क्रिय समर्पण का मामला बताया। न्यायालय ने कहा कि लड़की ने अधिकारियों की उपस्थिति में असहाय महसूस किया और यह निष्कर्ष निकाला कि उसका समर्पण भय का परिणाम था और इसलिए कानून की दृष्टि में कोई सहमति नहीं थी। यह अंतिम निर्णय नहीं था,सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अंतिम फैसले में इस फैसले को पलट दिया और पुलिसकर्मियों को इस आधार पर बरी कर दिया कि लड़की के शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं थे और लड़की ने कोई शोर नहीं मचाया,जिससे यह संकेत मिलता है कि कथित यौन संबंध एक शांतिपूर्ण मामला था।
पीड़िताओं की सामाजिक हकीकत
अदालतों में बलात्कार को लेकर सामने आने वाले कुछे मामलों के बीच इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उच्च मापदन्डों पर आधारित हमारे समाज में मूल्यों और आदर्शों की मिसालें तो दी जाती है,लेकिन महिलाओं से व्यवहार और आचरण में यह सिद्धांत अक्सर धराशायी हो जाते है। ऐसे में उम्मीदें अदालतों पर टिक जाती है और वहां से यह अपेक्षा की जाती है,वह समावेशी समाज की स्थापना के लिए बलात्कार जैसे घृणित मामलों के लेकर ज्यादा संवेदनशील हो। पर क़ानूनी प्रक्रियाओं की जटिलताओं के बीच महिला अस्मिता तार तार होने का अंदेशा भी बना रहता है और यह स्थिति करोड़ों महिलाओं के आत्मविश्वास और सम्मान के लिए चुनौतियां बढ़ा देती है।
पाकिस्तान: डीएनए सबूत के बावजूद सजा में राहत
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भारत जैसे उदार लोकतंत्र और पारदर्शी न्याय व्यवस्था में न्यायालयों के कई निर्णयों पर व्यापक बहस के बीच पाकिस्तान जैसे अस्थिर और सामंतवाद जैसे प्रभावित देश में महिलाओं की स्थिति और ज्यादा भयावह है। पिछले साल दिसम्बर में पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने बलात्कार के मामले में पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) के तहत दी गई बीस वर्षीय कठोर कारावास की सजा को धारा 496-बी (सहमति से व्यभिचार या ज़िना) के तहत पांच वर्षीय कठोर कारावास में परिवर्तित कर दिया गया था। न्यायालय ने एफआईआर दर्ज करने में देरी और पीड़िता के शरीर पर हिंसा के निशान न होने का हवाला दिया। यह मामला अक्टूबर 2015 में दर्ज किया गया था,जब बलात्कार पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी हसन खान ने सात महीने पहले उसके साथ बलात्कार किया था,जब वह अपने घर से बाहर पास के जंगल में गई थी। इस हमले के परिणामस्वरूप पीड़िता गर्भवती हो गई और बाद में उसने एक बच्चे को जन्म दिया। डीएनए परीक्षण से पुष्टि हुई कि आरोपी ही बच्चे का जैविक पिता था।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मलिक शहजाद अहमद द्वारा लिखित फैसले में शिकायत दर्ज करने में देरी का हवाला देते हुए कहा गया है कि यह घटना जबरन बलात्कार का मामला नहीं थी। अदालत ने इस तथ्य को आधार बनाया था की इस घटना के बाद कथित पीड़िता अपने घर लौट आई,जहां उसका भाई और परिवार के अन्य सदस्य रहते थे,लेकिन वह लगभग सात महीने तक चुप रही। सात महीने तक शिकायतकर्ता की चुप्पी उसके आचरण के विरुद्ध बहुत कुछ कहती है,इसलिए सात महीने की देरी से शिकायतकर्ता द्वारा बताई गई जबरन बलात्कार की कहानी पर आंख बंद करके भरोसा नहीं किया जा सकता,ऐसा बाकायदा आदेश में कहा गया। चिकित्सा अधिकारी ने कथित पीड़िता के पूरे शरीर पर हिंसा के किसी भी ठीक हुए निशान को नोट नहीं किया। यहां तक कि कथित पीड़िता के कपड़े भी पुलिस या निचली अदालत के समक्ष यह साबित करने के लिए पेश नहीं किए गए कि घटना के समय वे फटे हुए थे। इससे पता चलता है कि कथित पीड़िता ने कोई प्रतिरोध नहीं किया,ऐसा फैसले में कहा गया।
पीड़िताओं की सामाजिक हकीकत
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यहां पीड़िता की स्थिति और उसके हौंसलें किसी भी समाज के लिए मिसाल से कम नहीं,लेकिन न्याय व्यवस्था ने उसे नजरअंदाज कर दिया। पीड़िता कम उम्र की थी और उसके माता-पिता का देहांत हो चुका था। इन परेशानियों से जूझते हुए उसका पालन पोषण बड़े भाई ने किया है और वह अपने गरीब भाई के साथ ही एक टूटे फूटे घर में रहती थी। भाई दिहाड़ी मजदूर था और उसने घर में टॉयलेट नहीं थी,यह स्थिति भारत के सामाजिक परिवेश और सामाजिक न्याय की स्थिति से अलग नहीं है। अपराधियों ने पीड़िता के भाई को धमकाया,जिसके सबूत भी अदालत के सामने पेश किये गए। सामन्ती और प्रभाव रखने वाले अपराधियों के सामने डटी हुई पीड़िता के साहस और न्याय के लिए लड़ाई तथा एक गरीब भाई के हौंसले तब पस्त हो गए जब अदालत ने पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान न होने का लाभ आरोपी पक्ष को दे दिया।
वैवाहिक बलात्कार और न्यायिक बहस
भारत और पाकिस्तान में लैंगिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के सरकारी दावों के उलट इन देशों की जमीनी हकीकत बेहद भयावह है। बलात्कार के दंश भोगने वाली पीडिताओं और करोड़ों महिलाओं को अदालती निर्णय और न्यायाधीशों के बयान और ज्यादा परेशान कर देते है। भारत के 45 वें मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने अप्रैल 2019 में,बेंगलुरु में एक सम्मेलन के दौरान,वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में लाने का विरोध करते हुए यह विचार व्यक्त किया था कि ऐसा करने से भारतीय पारिवारिक ढांचे को नुकसान होगा। उन्होंने अपने इस विचार को इस प्रकार स्पष्ट करते हुए कहा था की मेरी निजी राय में,वैवाहिक बलात्कार को भारत में अपराध नहीं माना जाना चाहिए,क्योंकि इससे परिवारों में पूर्ण अराजकता फैल जाएगी।
कानून और संवेदनशीलता की जरूरत
भारत में बलात्कार को भारतीय दंड संहिता की धारा-375 के तहत किसी महिला के साथ उसकी सहमति के बिना जानबूझकर,गैरकानूनी यौन संबंध के रूप में परिभाषित किया गया है। यौन उत्पीड़न,यौन सम्बन्धों से कहीं ज्यादा दर्द,अवसाद और अपमान देकर जाता है और पीड़िता और उसके परिवार के लिए यह स्थिति घुट-घुट कर मरने जैसे होती है। अफ़सोस न तो भारत और न ही पाकिस्तान में बलात्कार की स्थिति की संवेदनशीलता को समझा जा रहा है और अदालतें भी महिला गरिमा से जुड़े सवालों पर विराम देने में नाकामयाब हो रही है।
(लेखक डॉ.ब्रह्मदीप अलूने अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं।)
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