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Indore Water Tragedy: मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी और देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों ने पुरानी पड़ चुकी शहरी जल वितरण प्रणाली की कलई खोल दी है।
भागीरथपुरा क्षेत्र में सीवेज और पेयजल लाइन के मिल जाने से जो स्वास्थ्य संकट खड़ा हुआ है, वह केवल इंदौर नहीं, बल्कि राजधानी भोपाल सहित राज्य के महानगरों और देश के हर उस शहर के लिए खतरे की घंटी है जो दशकों पुरानी पाइपलाइनों पर निर्भर हैं। इस घटना से सरकार और शहरों में वाटर सप्लाई की जिम्मेदारी संभालने वाली संस्थाओं को क्या सबक लेना चाहिए। व्यवस्था में क्या और कैसे सुधार करना चाहिए इस बारे में बंसल न्यूज (डिजिटल) ने अर्बन डेवलपमेंट के एक्सपर्ट मनोज सिंह से चर्चा कर उनके सुझाव जाने।
क्रेडाई भोपाल के अध्यक्ष मीक के मुताबिक 'स्वच्छता' में नंबर वन होने के साथ-साथ; अब 'जल सुरक्षा' में भी स्मार्ट बनने का समय आ गया है। इसके लिए सरकार का नगरीय प्रशासन विभाग उड़ीसा के पुरी मॉडल और जापान के टोक्यो मॉडल से सीख ले सकता है।
1. समस्या की जड़: पुरानी लाइनें और 'क्रॉस-कंटामिनेशन'
इंदौर की घटना का मुख्य कारण पेयजल लाइन का सीवेज लाइन का बहुत पास-पास होना और संपर्क में आना है। भोपाल और इंदौर के पुराने बसाहटों में दशकों पुरानी पाइपलाइनें जर्जर हो चुकी हैं। जब पानी की सप्लाई बंद होती है, तो पाइप में वैक्यूम बन जाता है, जो पास की सीवेज लाइन से गंदे पानी को अंदर खींच लेता है। इसे 'बैक-साइजिंग' कहते हैं।
2. देश का बेस्ट मॉडल: ओडिशा के पुरी का 'ड्रिंक फ्रॉम टैप' मिशन
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जहां इंदौर इस समस्या से जूझ रहा हैं, वहीं ओडिशा का पुरी शहर भारत का पहला शहर है जिसने '24x7 ड्रिंक फ्रॉम टैप' नल से सीधे पीने योग्य पानी के मिशन को 2021 में ही हासिल कर लिया था।
समाधान क्या है? पुरी में पानी की सप्लाई 24 घंटे चालू रहती है। इससे पाइपलाइन में हमेशा 'पॉजिटिव प्रेशर' बना रहता है। जब पाइप में दबाव होता है, तो बाहर का गंदा पानी या सीवेज लीकेज होने पर भी अंदर नहीं घुस सकता।
सीख: मध्यप्रदेश के शहरों को 'रुक-रुक कर पानी' देने के बजाय 24x7 सप्लाई सिस्टम पर शिफ्ट होना होगा। यह केवल सुविधा नहीं, बल्कि सुरक्षा का मामला है।
3. ग्लोबल बेंचमार्क: टोक्यो जापान की 'लीकेज प्रिवेंशन' तकनीक
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जापान की राजधानी टोक्यो में लीकेज रेट दुनिया में सबसे कम मात्र 3% है, जबकि भारतीय शहरों में यह 40-50% तक है।
स्टेनलेस स्टील पाइप: टोक्यो ने अपनी पुरानी लोहे और सीसा की पाइपलाइनों को बदलकर 'कोरुगेटेड स्टेनलेस पाइप्स का उपयोग शुरू किया। ये पाइप भूकंप के झटकों को भी झेल सकते हैं और इनमें जंग नहीं लगता, जिससे लीकेज का खतरा खत्म हो जाता है।
सैम-डे रिपेयर: टोक्यो में एक विशेष टीम है जो लीकेज की सूचना मिलने के उसी दिन उसे ठीक करती है। इंदौर में लीकेज का पता चलने और उसे ठीक करने में कई दिन लग गए, जो घातक सिद्ध हुआ।
4. टेक्नोलॉजी का उपयोग: सिंगापुर का 'स्मार्ट वॉटर ग्रिड'
सिंगापुर पानी की हर बूंद का हिसाब रखता है। वहां पूरे शहर में हजारों डिजिटल सेंसर लगे हैं जो पानी की गुणवत्ता पीएच लेवल, क्लोरीन और प्रेशर की रीयल-टाइम निगरानी करते हैं।
तत्काल अलर्ट: यदि किसी पाइप में सीवेज का पानी मिलता है, तो सेंसर तुरंत कंट्रोल रूम को अलर्ट भेजते हैं और ऑटोमेटेड वाल्व उस हिस्से की सप्लाई बंद कर देते हैं।
भोपाल-इंदौर के लिए: हमें मैनुअल टेस्टिंग के भरोसे रहना छोड़ना होगा और स्कॉडा यानी सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डेटा एक्विजिशन सिस्टम को पूरी तरह लागू करना होगा।
क्या है सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डेटा एक्विजिशन सिस्टम?
स्कॉडा एक कंप्यूटर-आधारित सिस्टम है जो इंडस्ट्रियल और इंफ्रास्ट्रक्चरल प्रक्रियाओं की निगरानी, नियंत्रण और डेटा एकत्र करने के लिए उपयोग किया जाता है, जिससे ऑपरेटरों को रियल-टाइम डेटा के आधार पर महत्वपूर्ण निर्णय लेने और दक्षता बढ़ाने में मदद मिलती है. यह सेंसर और प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर के माध्यम से मशीनों से जुड़ता है और केंद्रीकृत इंटरफ़ेस के माध्यम से पूरे ऑपरेशन को प्रबंधित करने की अनुमति देता है, जिसका उपयोग बिजली, पानी और विनिर्माण जैसे कई उद्योगों में होता है.
अब क्या कदम उठाने होंगे?
शहरी विकास के आधुनिक मानकों और क्रेडाई जैसे संगठनों का मानना है कि प्रशासन को तुरंत निम्नलिखित सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए।
1. पाइपलाइन ऑडिट: शहरों के उन सभी हिस्सों को चिन्हित किया जाए जहां सीवर और पानी की लाइनें 1 मीटर से कम दूरी पर हैं।
2. डेडिकेटेड यूटिलिटी डक्ट्स: भविष्य की खुदाई में पानी और सीवेज की लाइनों को अलग-अलग कंक्रीट डक्ट्स में डाला जाए।
3. सामुदायिक भागीदारी पुरी मॉडल: 'जल साथी' जैसे सामुदायिक समूहों को नियुक्त किया जाए जो अपने मोहल्ले में पानी की गुणवत्ता की जांच करें।
इंदौर की घटना एक दुखद सबक है। यदि अब भी हमने 'स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर' में निवेश नहीं किया, तो हम बीमारियों के इलाज में खर्च बढ़ने से रोक नहीं पाएंगे।
स्रोत: पुरी सुजल मिशन रिपोर्ट, टोक्यो वॉटरवर्क्स ब्यूरो डाटा, एवं स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स जनवरी 2026
(एक्सपर्ट- मनोज मीक शहरी विकास के जानकार, क्रेडाई भोपाल के अध्यक्ष एवं ‘कमाल का भोपाल’ नागरिक अभियान के फाउंडर हैं।
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