एमपी का अनोखा गांव: जहां बच्चा-बच्चा बोलता है संस्कृत, बेटियां पेड़ों को बांधती हैं राखी

MP sanskrit

भोपाल। मप्र के नरसिंहपुर जिले की करेली तहसील के अंतर्गत आने वाला मोहद गांव जहां सारे लोग संस्कृतभाषी हैं। गांव के बच्चे, जवान, बुजुर्ग सभी धाराप्रवाह संस्कृत बोलते हैं। यहां जाने पर लगता है जैसे गांव की हवाओं में संस्कृत की खुशबू फैल रही है। करेली से छह किमी दूर स्थित इस गांव की पहचान संस्कृत भाषा की वजह से है।

25 साल हो गए संस्कृत भाषी गांव बने

गांव को संस्कृत गांव बने लगभग 25 साल हो गए हैं। मोहद को संस्कृतभाषी गांव बनाने का बीड़ा उठाया था यहां रहने वाले भैयाजी उर्फ सुरेंद्र सिंह चौहान ने। उनके प्रयासों से आज इस गांव की राज्य में एक अलग पहचान है। बतादें कि लगभग 6 हजार की आबादी वाले इस गांव में तीन प्राथमिक स्कूल हैं, जहां संस्कृत की कक्षाएं लगती हैं। इन स्कूलों में व्याकरण सिखाने से ज्यादा संस्कृत में बोल-चाल पर जोर दिया जाता है।

देश में 5 संस्कृतभाषी गांव हैं

मालूम हो कि देश में संस्कृत गांव के रूप में 5 गांवों को जाना जाता है। इनमें से दो गांव मैटूर और होशल्ली कर्नाटक में हैं। तीन गांव मोहद, बगुवार और झीरी मध्यप्रदेश में हैं, एक गांव सासन उड़ीसा में है।

दैनिक इस्तेमाल की चीजों पर संस्कृत की पर्ची

सबसे पहले संस्कृत भावना को जगाने के लिए बैंगलोर से आई सुचेता बहन ने जबलपुर से संस्कृत शिक्षकों को ले जाकर गांव में कक्षाएं लीं। इसके बाद दिल्ली, बेंगलूरू से संस्कृत साहित्य को गांव में सुलभ कराया। उन्होंने गांव में दैनिक इस्तेमाल की चीजों पर संस्कृत शब्दों की पर्ची लगाई। आज गांव में चौपाल, सामूहिक आयोजनों और दूसरे से भेंट होने पर संस्कृत में ही वार्तालाप किया जाता है।

संस्कृत ने गांव के लोगों को बदल दिया

संस्कृत ने यहां रहने वालों का तौरतरीका भी बदला है। करीब 600 परिवारों और 5 हजार से ज्यादा आबादी वाले इस गांव में दो दशक पहले तक 22 शराब की भटिट्यां चला करती थीं। आज यहां दूध की डेरियां चलती हैं। जिस चौपाल पर लोग जुआ खेलते थे, वहां मुक्ताकाशी वाचनालय चलते हैं। इस गांव की हर कन्या रक्षाबंधन पर वृक्षों को राखी बांधती है। गांव में हर बच्चा स्कूल जाता है, तो हर किसान बनाता है अपना खाद और बीज। गांव में एक मोहल्ला हरिजनों का भी है, जहां विराजते हैं गणपति, लेकिन स्थापना से लेकर विसर्जन तक कंधा देने वालों में ठाकुर और ब्राह्मण भी पीछे नहीं नहीं रहते।

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