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MP Children Kidney Failure: मासूमों के लिए जानलेवा बना ये कफ सिरप, किडनी फेल से बच्चों की मौत के बाद प्रशासन ने किया बैन

एमपी के छिंदवाड़ा में 6 बच्चों की किडनी फेल होने से मौत हड़कंप मचा हुआ है। अब बच्चों को दी गई कफ सिरप की जांच में सामने आया कि एक खास कफ सिरप में हानिकारक रसायन डायएथिलीन ग्लायकॉल मिला है। इसके बाद प्रशासन ने तत्काल सिरप की बिक्री पर रोक लगाई है।

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Vikram Jain
MP Children Kidney Failure: मासूमों के लिए जानलेवा बना ये कफ सिरप, किडनी फेल से बच्चों की मौत के बाद प्रशासन ने किया बैन

हाइलाइट्स

  • छिंदवाड़ा में किडनी फेल होने से 6 बच्चों की मौत।
  • कफ सिरप में पाया गया खतरनाक केमिकल।
  • प्रशासन ने कफ सिरप की बिक्री पर लगाया बैन।
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Chhindwara Children's Death Case Cough Syrup Banned: मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में एक रहस्यमयी बीमारी का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। जिले में बीते कुछ दिनों में एक के बाद एक 6 बच्चों की किडनी फेल होने से मौत हो चुकी हैं। शुरुआती जांच में इन मौतों के पीछे एक कफ सिरप (सर्दी खांसी की दवा) को जिम्मेदार माना जा रहा है, जिसमें हानिकारक रसायन मिला होने की पुष्टि हुई है। अब मामले में गंभीरता दिखाते हुए प्रशासन ने कोल्ड्रिफ (Coldrif) और नेक्सट्रॉस डीएस (Nextro-DS) कफ सिरप की बिक्री पर रोक लगाई है साथ ही कड़ी चेतावनी जारी की है।

कफ सिरप बना मौत का कारण?

दरअसल, छिंदवाड़ा में अगस्त के आखिरी सप्ताह से बच्चों में सर्दी, खांसी और बुखार के लक्षण देखे गए। इलाज के लिए जब उन्हें अस्पतालों में भर्ती किया गया, तो धीरे-धीरे उनकी किडनी फेल होने लगी। पहला मामला 24 अगस्त को सामने आया और पहली मौत 7 सितंबर को हुई। इसके बाद कुल 6 बच्चों की जान चली गई।

बच्चों की किडनी से संबंधित सैंपल लेकर जांच के लिए भेजे गए थे। लैब रिपोर्ट में सिरप में डायएथिलीन ग्लायकॉल (Diethylene Glycol) दूषित पाया गया, जो किडनी को नुकसान पहुंचाता है। इसे किडनी फेल होने का कारण माना जा रहा है। फिलहाल 5 से 6 बच्चे अभी भी इलाजरत हैं, कुछ नागपुर के अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं, जबकि कुछ का इलाज छिंदवाड़ा के सरकारी अस्पतालों में चल रहा है। इनमें से दो से तीन बच्चों की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है।

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बच्चों को दी थी एक जैसी कफ सिरप

छिंदवाड़ा मेडिकल कॉलेज डॉ. पवन नांदुलकर शिशु रोग विशेषज्ञ ने बताया कि डॉक्टर्स और मेडिकल टीम ने जब अस्पताल में इन बच्चों की मेडिकल हिस्ट्री और किडनी बायोप्सी की रिपोर्ट जाँची तो सामने आया कि इन 80% बच्चों को एक जैसी कफ सिरप दी गई थी। सैंपल की जांच में डायएथिलीन ग्लायकॉल नामक रसायन पाया गया, जो किडनी फेलियर का मुख्य कारण हो सकता है।

जांच रिपोर्ट और विशेषज्ञों की सलाह के बाद जिला कलेक्टर शीलेंद्र सिंह ने कोल्ड्रिफ (Coldrif) और नेक्सट्रॉस डीएस (Nextro-DS) नाम के कफ सिरप की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही डॉक्टरों, मेडिकल स्टोर और पेरेंट्स को एडवाइजरी जारी कर इन दवाओं से दूर रहने की चेतावनी दी गई है। मीटिंग में सीईओ जिला पंचायत, सीएमएचओ, मेडिकल कॉलेज डीन, डॉक्टर्स, ड्रग्स इंस्पेक्टर और बाकी अधिकारी मौजूद थे।

कफ सीरप की बिक्री पर लगाया बैन

छिंदवाड़ा कलेक्टर शीलेंद्र सिंह का कहना है कि अब तक की जांच और मेडिकल रिपोर्ट्स से यह आशंका मजबूत हुई है कि बच्चों की किडनी फेल होने की वजह किसी दवा में मौजूद हानिकारक तत्व हो सकते हैं। बॉयोप्सी रिपोर्ट भी इस दिशा में संकेत दे रही है।

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उन्होंने बताया कि अगस्त और सितंबर के दौरान परासिया सहित जिले के कई इलाकों में बच्चों में सर्दी-खांसी और बुखार के मामले अचानक बढ़ने लगे थे। बच्चों को इलाज के लिए अस्पतालों में भर्ती किया गया। शुरू में सामान्य लक्षण लगे, लेकिन अगस्त के अंतिम सप्ताह में कुछ बच्चों की तबीयत तेजी से बिगड़ने लगी। खास बात यह रही कि इन सभी बच्चों को सर्दी-खांसी रोकने के लिए एक जैसी कफ सिरप दी गई थी, जिसके बाद उनकी हालत और बिगड़ी।

24 अगस्त को आया था पहला केस

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. नरेश गुन्नाडे ने जानकारी दी कि पहला संदिग्ध मामला 24 अगस्त को सामने आया था, जबकि पहली मौत 7 सितंबर को हुई। शुरुआती लक्षणों में बच्चों को तेज बुखार के साथ पेशाब करने में परेशानी हो रही थी। स्थिति गंभीर होती गई, जिसके बाद प्रभावित बच्चों को नागपुर के अस्पतालों में रेफर किया गया। इलाज के तमाम प्रयासों के बावजूद बच्चों को नहीं बचाया जा सका।

वायरल संक्रमण नहीं, रिपोर्ट आई निगेटिव

संक्रमण की आशंका को देखते हुए बच्चों के रक्त सैंपल पुणे स्थित वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट भेजे गए थे। जांच रिपोर्ट में किसी भी तरह के वायरल संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई, जो किडनी फेलियर का कारण बन सकता हो। इसके साथ ही, यह भी स्पष्ट हुआ कि बीमारी संक्रामक नहीं है।

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पानी और खून की जांच भी रही सामान्य

जिन गांवों से बच्चों की मौत की खबरें आई थीं, वहां के पेयजल सैंपल भी परीक्षण के लिए लिए गए, लेकिन पानी में कोई हानिकारक तत्व नहीं मिला। बीते एक सप्ताह में जिलेभर में 3,500 से अधिक छोटे बच्चों की सी-रिएक्टिव प्रोटीन (CRP) जांच कराई गई, ताकि किसी छिपे हुए संक्रमण का पता चल सके, लेकिन अधिकांश रिपोर्ट सामान्य पाई गईं।

बच सकती थी मासूमों की जान

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते इन दवाओं की जांच होती, तो शायद मासूम बच्चों की जान बच सकती थी। अब प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई तेज हो गई है, लेकिन सवाल उठता है – क्या बहुत देर हो चुकी है?

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