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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट।
(रिपोर्ट- सोनल पांडेय, जबलपुर)
MP High Court Guest Teacher Outsourcing Stay: मध्यप्रदेश के अतिथि शिक्षकों को लेकर शिक्षा विभाग के एक चौंकाने वाले फैसले पर जबलपुर हाईकोर्ट ने ब्रेक लगा दिया है। विभाग ने वर्षों से कार्यरत कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर्स को 'गेस्ट टीचर फैकल्टी सिस्टम' से हटाकर आउटसोर्सिंग के अधीन करने का आदेश दिया था। इस नीतिगत बदलाव के खिलाफ 119 शिक्षकों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने शासन के आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने अतिथि शिक्षकों की आउटसोर्सिंग प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाते हुए यथास्थिति का आदेश दिया है।
92 हजार स्कूलों के भविष्य से जुड़ा मामला
मध्यप्रदेश के 92 हजार सरकारी स्कूलों में डिजिटल शिक्षा की नींव रखने वाले कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर्स (IT अतिथि शिक्षक) के लिए न्यायपालिका से राहत भरी खबर आई है। जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य शासन के उस विवादास्पद फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत इन शिक्षकों को आउटसोर्स कर्मचारी बनाने की तैयारी की जा रही थी।
जस्टिस मनिंदर एस. भट्टी की एकलपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश सरकार और लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि अगली सुनवाई तक इस मामले में यथास्थिति (Status Quo) बरकरार रखी जाए। इसका मतलब है कि फिलहाल अतिथि कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर्स की मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी।
क्या था पूरा विवाद?
मध्यप्रदेश के शासकीय स्कूलों में केंद्र और राज्य की संयुक्त नीति के तहत कंप्यूटर शिक्षा के लिए गेस्ट फैकल्टी के रूप में नियुक्तियां की गई थीं। ये शिक्षक सालों से सेवाएं दे रहे थे। लेकिन सत्र 2025-26 के लिए नवंबर माह में शिक्षा विभाग ने अचानक नीति बदलते हुए आदेश जारी किया कि दो सत्र पूरे होने के बाद इन्हें 'अतिथि शिक्षक मैनेजमेंट सिस्टम' (GFMS) से बाहर कर दिया जाएगा और इनकी नियुक्तियां अब निजी आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से होंगी।
आरक्षण और भविष्य पर मंडरा रहा था संकट
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता आर्यन उरमालिया ने कोर्ट के समक्ष एक महत्वपूर्ण तर्क रखा। उन्होंने बताया कि सरकारी गजट के अनुसार, यदि कोई अतिथि शिक्षक 3 सत्र या 200 दिन की सेवा पूरी करता है, तो उसे नियमित शिक्षक भर्ती में 50 प्रतिशत आरक्षण का वैधानिक लाभ मिलता है। यदि सरकार इन्हें ढाई साल में ही आउटसोर्सिंग में डाल देती, तो ये शिक्षक इस लाभ से हमेशा के लिए वंचित हो जाते।
शिक्षा की निरंतरता पर सवाल
अदालत को बताया गया कि प्रदेश के अधिकांश स्कूलों में मात्र एक या दो कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर्स हैं। अचानक नीति बदलने से न केवल इन शिक्षकों का रोजगार संकट में पड़ता, बल्कि स्कूलों में चल रही तकनीकी शिक्षा की निरंतरता भी प्रभावित होती। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि शासन का आदेश शिक्षकों के अधिकारों का हनन करता है।
हजारों शिक्षकों की निगाहें अब 17 फरवरी पर
हालांकि, यह याचिका 119 कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर्स की ओर से दायर की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट के इस स्टे का प्रभाव प्रदेश के उन हजारों शिक्षकों पर पड़ेगा जो इसी तरह की स्थिति का सामना कर रहे हैं। अब 17 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई में सरकार को अपना पक्ष रखना होगा कि आखिर क्यों एक स्थापित व्यवस्था को अचानक आउटसोर्सिंग में बदलने का निर्णय लिया गया।
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