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Police Constable Ratan Kolhe Case High Court Decision: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इंदौर खंडपीठ ने प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों का हवाला देते हुए एक कांस्टेबल की सेवा समाप्ति के आदेश को निरस्त कर दिया है। मामला यह था कि विभाग ने एक ही दिन में कारण बताओ नोटिस जारी किया और उसी दिन कांस्टेबल को नौकरी से निकाल दिया। न्यायमूर्ति जयकुमार पिल्लई की पीठ ने इसे कानून का उल्लंघन मानते हुए पुलिस अधीक्षक (SP) द्वारा जारी आदेश को रद्द कर दिया है। साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता रतन कोल्हे को 50% पिछले वेतन के साथ तत्काल सेवा में बहाल करने के आदेश दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, मध्यप्रदेश पुलिस में करीब 25 वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे कांस्टेबल रतन कोल्हे के लिए पिछले तीन साल संघर्ष भरे रहे। कोल्हे को जुलाई 2021 में अवैध खनन से जुड़े एक प्रकरण में वाहन जब्ती की कार्रवाई को लेकर शिकायत मिलने पर निलंबित कर दिया गया था।
विभागीय जांच के बिना ही किया बर्खास्त
पुलिस आरक्षक रतन कोल्हे के मामले में पुलिस अधीक्षक ने जुलाई 2021 में एक कारण बताओ नोटिस जारी किया था। हैरानी की बात यह रही कि विभाग ने कांस्टेबल को अपना पक्ष रखने के लिए समय देने के बजाय, उसी दिन बर्खास्तगी का आदेश भी जारी कर दिया गया। इसके खिलाफ कोल्हे ने विभाग के भीतर अपील की, लेकिन वहां से भी उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने एडवोकेट प्रसन्ना आर. भटनागर के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि किसी भी कर्मचारी को सेवा से हटाने से पहले विस्तृत विभागीय जांच और सुनवाई का मौका देना अनिवार्य है। बिना पक्ष सुने 25 साल की सेवा को एक झटके में खत्म करना प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए माना कि एसपी का आदेश कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना जल्दबाजी में लिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड देने से पहले विभागीय जांच और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।
कांस्टेबल रतन कोल्हे की तत्काल बहाली का आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने रतन कोल्हे की याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने निर्देश दिया कि:
- याचिकाकर्ता को तत्काल प्रभाव से पुलिस विभाग में फिर से नियुक्त किया जाए।
- उन्हें उनके पिछले वेतन का 50% भुगतान किया जाए और अन्य सभी सेवा लाभ (Service Benefits) दिए जाएं।
- कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विभाग चाहे तो कानून के दायरे में रहकर नए सिरे से विभागीय जांच शुरू कर सकता है, लेकिन बिना सुनवाई के बर्खास्तगी स्वीकार्य नहीं है।
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