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Jabalpur high court।
MPPSC Assistant Director Recruitment Merit List Controversy: मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) द्वारा कुटीर एवं ग्रामोद्योग मंत्रालय के अधीन सहायक संचालकों (तकनीकी) के 11 पदों पर की गई भर्ती प्रक्रिया कानूनी पचड़े में फंस गई है। बालाघाट निवासी नितिन कुमार मेश्राम द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जबलपुर हाईकोर्ट ने आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अधिक अंक पाने वाले आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को अनारक्षित प्रतीक्षा सूची में शामिल करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। मामले में जस्टिस विशाल धगट की बेंच ने मध्यप्रदेश शासन औरMPPSC को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है।
ज्यादा अंक, फिर भी वेटिंग लिस्ट में नाम?
दरअसल, याचिकाकर्ता नितिन कुमार मेश्राम ने आर.पी.एस. लॉ एसोसिएट्स के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। इसमें उन्होंने सहायक संचालकों के 11 पदों की भर्ती प्रक्रिया और आरक्षण नियमों की गलत व्याख्या को चुनौती दी है। याचिका में बताया कि उन्होंने अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के तहत सहायक संचालक पद के लिए आवेदन किया था। आयोग ने 6 दिसंबर 2025 को परिणाम जारी किया, लेकिन याचिकाकर्ता के अंक सार्वजनिक नहीं किए गए। बाद में 16 दिसंबर को जारी चयन सूची में एक अन्य अभ्यर्थी लखन सिंह दौहरे (SC वर्ग) का चयन 53 अंकों पर कर लिया गया, जबकि याचिकाकर्ता को अनारक्षित वर्ग की प्रतीक्षा सूची में दूसरे नंबर पर रखा गया।
संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप
वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने कोर्ट में दलील दी कि याचिकाकर्ता के अंक चयनित उम्मीदवार से अधिक हैं। इसके बावजूद उसे मुख्य सूची से बाहर कर वेटिंग में डालना आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा 4(4) और संविधान के अनुच्छेद 14, 16 व 335 के विरुद्ध है। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि एक आरक्षित वर्ग के मेधावी छात्र को अनारक्षित श्रेणी में स्थान मिलना चाहिए, न कि उसे प्रतीक्षा सूची में रखकर कम अंक वाले को नियुक्ति दी जाए।
आयोग और शासन को नोटिस
जस्टिस विशाल धगट की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्यप्रदेश शासन, लोक सेवा आयोग और चयनित अभ्यर्थी लखन सिंह दौहरे को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि इस भर्ती से जुड़ी समस्त नियुक्तियां अब याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी। इसका अर्थ है कि यदि कोर्ट याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो वर्तमान नियुक्तियां निरस्त या संशोधित की जा सकती हैं।
MPPSC की कार्यप्रणाली फिर सवालों में
रिजल्ट और सिलेक्ट लिस्ट के बीच अंकों का खुलासा न करना और वेटिंग लिस्ट के निर्माण में विसंगतियों के कारण आयोग की पारदर्शिता पर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप से अन्य प्रभावित अभ्यर्थियों में भी न्याय की उम्मीद जगी है।
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