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MP Sant Samiti vs Kinnar Akhara: मध्यप्रदेश अखिल भारतीय संत समिति के कार्यकारी अध्यक्ष बीएन महामंडलेश्वर अनिल आनंद ने भोपाल कलेक्टर और पुलिस कमिश्नर को ज्ञापन सौंपा। गुरुवार, 26 फरवरी 2026 को किन्नर अखाड़े के संस्थापक ऋषि अजय दास उर्फ अजय कुमार दास को भी लेटर भेजा। जिसमें संस्थापक से सात दिन में जवाब मांगा है। जबकि कलेक्टर और पुलिस कमिश्नर से कार्रवाई की मांग की गई।
इनका किन्नर अखाड़े से कोई लेना देना ही नहीं
मध्यप्रदेश अखिल भारतीय संत समिति के कार्यकारी अध्यक्ष बीएन महामंडलेश्वर अनिल आनंद ने कहा कि कुछ दिन पहले किन्नर अखाड़े के नाम पर जिन लोगों ने जगदगुरु शंकराचार्य, महामंडलेश्वर बनाए हैं, पता चला है कि दो उनके फाड़ और इनका किन्नर अखाड़े से कोई लेना देना ही नहीं। उन्होंने किस हैसियत से यह पद दिए ? क्या यहां नौटंकी चल रही है, क्यां यहां सनातन की नौटंकी का बाजार चल रहा है? हमने पुलिस कमिश्नर से मांग की है कि 11 दिन में खंडन नहीं आने पर कार्रवाई की जाए।
महाशिवरात्रि पर 10 किन्नरों को बनाया महामंडलेश्वर
दरअसल, मध्यप्रदेश के भोपाल में 15 फरवरी को महाशिवरात्रि पर्व किन्नर जिहाद और धर्मांतरण की चुनौतियों के बीच किन्नर अखाड़ा ने पुष्कर पीठ के लिए देश की पहली किन्नर शंकराचार्य घोषित किया गया। यहां लालघाटी क्षेत्र में आयोजित एक भव्य समारोह में हिमांगी सखी का पट्टाभिषेक किया गया। जहां 200 किन्नरों की घर वापसी के साथ 10 प्रमुख किन्नर संतों को महामंडलेश्वर बना दिया।
संत समिति की ओर से भेजे लेटर में जानें क्या लिखा?
समिति के कार्यकारी अध्यक्ष बीएन महामंडलेश्वर अनिल आनंद ने लिखा कि शंकराचार्य पद की स्थापना जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी। परंपरागत रूप से यह पद भारत की चार अधिकृत पीठों तक सीमित हैं। जिसमें शृंगेरी शारदा पीठ, द्वारका शारदा पीठ, गोवर्धन मठ पुरी और ज्योतिर्मठ प्रमुख हैं। इन चार पीठों के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को शंकराचार्य घोषित करने का अधिकार नहीं है।
किस मान्य अखाड़े, परिषद से मिला है ये अधिकार
समिति के कार्यकारी अध्यक्ष बीएन महामंडलेश्वर अनिल आनंद ने लेटर के जरिए किन्नर अखाड़ा के संस्थापक से पूछा है कि क्या आपके पास तथाकथित नियुक्ति के लिए किसी मान्य अखाड़े, तेरह अखाड़ों या अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की विधिवत अनुमति है? क्या काशी विद्वत परिषद या किसी शास्त्रसम्मत मान्यता प्राप्त निकाय से आपको लिखित अनुमोदन मिला है? यदि ऐसी कोई अनुमति है, तो उसकी प्रमाणित प्रति 7 दिन में सार्वजनिक करें।
तत्काल पदनाम के उपयोग, प्रचार पर रोक लगाएं
यदि तय अवधि में वैध प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाए तो इसे धार्मिक पदनाम के दुरुपयोग, समाज में भ्रम फैलाने और धार्मिक भावनाएं आहत करने का प्रयास माना जाएगा। यह अंतिम चेतावनी है, ताकि तत्काल प्रभाव से शंकराचार्य पदनाम के उपयोग और उससे संबंधित प्रचार-प्रसार पर रोक लगाएं और सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण जारी करें।
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