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MP में मेयर फंड पर सरकार की रोक: बजट प्रस्ताव में महापौर निधि का बजट में प्रावधान नहीं, विभाग ने कमिश्नरों को थमाया आदेश

मध्यप्रदेश सरकार ने नियमों का हवाला देते हुए नगर निगमों में महापौर निधि पर रोक लगा दी है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि बजट में इस फंड का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, जिससे अब विकास कार्यों के लिए अलग से बजट नहीं मिलेगा।

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Vikram Jain
Mayor Fund

MP Bhopal Mayor Fund Stopped: मध्यप्रदेश में अगले साल होने वाले नगरीय निकाय चुनावों से पहले राज्य सरकार ने एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने सभी नगर निगमों को निर्देश जारी किए हैं कि बजट प्रस्तावों में 'महापौर निधि' (Mayor Fund) के लिए कोई विशेष प्रावधान न किया जाए। विभाग का तर्क है कि मूल अधिनियम में ऐसी किसी निधि का अस्तित्व ही नहीं है। इस आदेश के बाद प्रदेश के महापौरों द्वारा अपनी मर्जी से स्वीकृत किए जाने वाले विकास कार्यों पर विराम लग सकता है। विभाग ने सभी निगम कमिश्नरों को पत्र लिखकर आगामी बजट नियमों के अनुसार तैयार करने के निर्देश दिए हैं, जिससे भोपाल और इंदौर जैसे बड़े शहरों के महापौरों की करोड़ों की निधि पर संकट मंडरा रहा है।

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महापौर निधि का प्रावधान नहीं

मध्यप्रदेश के नगरीय निकायों में अब जनप्रतिनिधियों को अपनी निधि (फंड) खर्च करने के लिए कड़े नियमों का सामना करना होगा। विभाग के उप सचिव प्रमोद कुमार शुक्ला द्वारा जारी आदेश के अनुसार, नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 के अध्याय 7 में वित्तीय प्राप्तियों और व्यय का अनुमान पत्रक (बजट) तैयार करने के नियम दिए गए हैं, लेकिन इसमें 'महापौर निधि' के संबंध में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

Mayor Fund MP

भोपाल और इंदौर में पड़ेगा सबसे ज्यादा असर

इस आदेश का सीधा असर भोपाल और इंदौर जैसे महानगरों पर पड़ेगा। भोपाल में पिछले बजट में महापौर मालती राय की निधि 5 करोड़ से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपए सालाना कर दी गई थी। इसी तरह इंदौर में भी महापौर पुष्यमित्र भार्गव के पास 10 करोड़ रुपए का फंड था। ग्वालियर में तो इसे बढ़ाकर 10 करोड़ करने का प्रस्ताव रखा जा चुका है। अब इन प्रस्तावों पर कानूनी संकट खड़ा हो गया है।

क्या कहता है नया सरकारी आदेश?

विभाग ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में बजट तैयार करते समय 'नगर पालिक निगम अधिनियम 1956' और 'लेखा एवं वित्त नियम 2018' का ही कड़ाई से पालन किया जाए। पत्र में लिखा गया है कि बजट में महापौर निधि का कोई वैधानिक आधार नहीं है, इसलिए अबकी बार बजट प्रस्तावों में नियमों से बाहर जाकर कोई प्रावधान न किया जाए।

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अध्यक्ष मेंबर-पार्षदों की निधि दोगुनी हो चुकी

पिछले साल भोपाल में एक तरफ पानी और प्रॉपर्टी टैक्स बढ़ाकर जनता की जेब पर बोझ डाला गया, तो दूसरी तरफ भोपाल और अन्य शहरों में न केवल महापौर, बल्कि निगम अध्यक्ष, एमआईसी (MIC) सदस्यों और पार्षदों की निधि भी दोगुनी कर दी गई थी।

  • महापौर: 10 करोड़ रुपए
  • अध्यक्ष: 5 करोड़ रुपए
  • MIC सदस्य: 1 करोड़ रुपए
  • पार्षद: 50 लाख रुपए
  • जोन अध्यक्ष: 10 लाख रुपए

आदेश के बाद अब यह संशय है कि अगले बजट में ये राशियाँ स्वीकृत होंगी या नहीं।

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मेयरों का तर्क: विकास कार्यों के लिए जरूरी है फंड

इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव का कहना है कि बजट में राशि तय करने का अधिकार निगम का होता है। आमतौर पर महापौर इस फंड का उपयोग शहर के किसी भी वार्ड में सड़क, नाली या अन्य विकास कार्यों के लिए करते हैं। जानकारों का मानना है कि यदि निधि बंद होती है, तो महापौर को छोटे-छोटे विकास कार्यों के लिए भी सरकारी मंजूरी और लंबी प्रक्रिया का इंतजार करना होगा।

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