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Bhopal AIIMS Corruption Case: केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को भोपाल की विशेष अदालत से उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब आय से अधिक संपत्ति के मामले में कोर्ट ने एम्स भोपाल के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. धीरेंद्र प्रताप सिंह के खिलाफ पेश की गई क्लोजर रिपोर्ट को सिरे से नकार दिया। कोर्ट ने जांच पर तीखे सवाल उठाते हुए कहा कि जिस मामले में आरोपी की संपत्ति आय से 87% अधिक पाई गई थी, उसे बाद में 'माइनस' में कैसे दिखा दिया गया? इस मामले की जांच उस इंस्पेक्टर ने की थी, जो खुद नर्सिंग घोटाले में रिश्वत लेते पकड़ा जा चुका है। घूस लेने के आरोप में जेल जा चुके इंस्पेक्टर राहुल राज ने इस केस की पड़ताल की थी। कोर्ट ने जांच में भारी खामियां और विरोधाभास पाते हुए नए सिरे से जांच के आदेश दिए हैं।
सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट खारिज
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. धीरेंद्र प्रताप सिंह के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मामले में एक नया मोड़ आ गया है। साल 2021 में 1 लाख रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए डॉ. सिंह को सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट से जो राहत मिलने वाली थी, उस पर कोर्ट ने पानी फेर दिया है। विशेष अदालत ने सीबीआई की जांच को 'अधूरा और विरोधाभासी' करार देते हुए मामले की फाइल फिर से खोलने का आदेश दिया है। अब मामले में सीबीआई को नए सिरे से जांच करनी होगी।
87% अधिक संपत्ति अचानक 'माइनस' कैसे हुई?
जांच की शुरुआत में डॉ. सिंह की संपत्ति उनकी ज्ञात आय से 87.32% अधिक पाई गई थी। लेकिन जब सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट पेश की, तो यह आंकड़ा बदलकर -3.32% (माइनस) हो गया। कोर्ट ने इस "जादुई बदलाव" पर कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत ने पाया कि आरोपी की पत्नी की ट्यूशन से होने वाली आय को बिना किसी पुख्ता दस्तावेज के जोड़ दिया गया, ताकि अवैध संपत्ति को वैध दिखाया जा सके।
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दागी इंस्पेक्टर ने की थी 'क्लीन चिट' की तैयारी
इस केस की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसकी जांच सीबीआई के तत्कालीन इंस्पेक्टर राहुल राज ने की थी। राहुल राज वही अधिकारी हैं, जिन्हें खुद सीबीआई ने नर्सिंग कॉलेज घोटाले में रिश्वत लेते हुए पकड़ा था। ऐसे में एक दागी इंस्पेक्टर द्वारा दूसरे आरोपी को क्लीन चिट देने की कोशिश पर अदालत ने गंभीर संदेह व्यक्त किया है।
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लॉकर की चाबी और सोने का रहस्य
तलाशी के दौरान सीबीआई को बैंक लॉकर की चाबी मिली थी, लेकिन जांच एजेंसी ने उसे कभी ऑपरेट ही नहीं किया। इसके अलावा, जब्त किए गए सोने के गहनों की कीमत और फ्लैट की रजिस्ट्री व स्टांप ड्यूटी के हिसाब में भी बड़े अंतर मिले हैं। कोर्ट ने पूछा कि जब साक्ष्य मौजूद थे, तो जांच को आधा-अधूरा क्यों छोड़ा गया? बिना किसी साक्ष्य के पत्नी की आय को आरोपी की बचत में शामिल किया गया।
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कोर्ट ने पूछे सीबीआई से तीखे सवाल
विशेष अदालत ने अपनी टिप्पणी में सीबीआई से चार प्रमुख बिंदुओं पर जवाब मांगा है:
लॉकर का रहस्य: चाबी मिलने के बावजूद लॉकर क्यों नहीं खोला गया?
बिना सबूत आय: पत्नी की ट्यूशन आय का कोई ठोस आधार क्यों नहीं दिया गया?
मूल्यांकन में अंतर: गहनों और फ्लैट की कीमतों में हेरफेर क्यों की गई?
बैंकिंग डेटा: लोन के ब्याज और स्टांप शुल्क का विवरण केस डायरी से गायब क्यों है?
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