जानिए कौन थे मन्नू भंडारी? मध्य प्रदेश से था उनका गहरा नाता

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नई दिल्ली। सोमवार को गुड़गांव के एक निजी अस्पताल में प्रसिद्ध लेखिका मन्नू भंडारी ( 90 वर्ष ) का निधन हो गया। मन्नू नई कहानी आंदोलन के अग्रदूतों में से एक थीं। उनकी गिनती परूषवादी समाज पर चोट करने वाली लेखिका के तौर पर होती थी। मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल 1931 को मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के भानपुरा में हुआ था।

उनका असली नाम?

मन्नू का असली नाम महेंद्र कुमारी था। लेकिन उन्होंने लेखन के लिए मन्नू नाम का चुनाव किया था। मन्नू भंडारी ने कहानी और उपन्यास दोनों विधाओं में कलम चलाई है। वे कई वर्षों तक दिल्ली के मीरांडा हाउस में अध्यापिका रहीं। इसके अलावा विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में प्रेमचंद सृजनपीठ की अध्यक्षा रहीं। उन्हें व्यास सम्मान, हिन्दी अकादमी, दिल्ली का शिखर सम्मान जैसी प्रतिष्ठित सम्मान मिले हैं। उनकी कहानी ‘यही सच है’ पर साल 1974 में बासु चटर्जी ने ‘रजनीगंधा’ फिल्म भी बनाई थी।

उनके पति भी उपन्यासकार थे

मन्‍नू भंडारी का पहला उपन्यास ‘एक इंच मुस्कान’ 1961 में प्रकाशित हुआ था। यह उपन्‍यास उनके पति, लेखक और संपादक राजेंद्र यादव के साथ मिलकर लिखा गया था। यह एक प्रयोगात्मक उपन्यास है। उस समय ‘ग्यारह सपनों का देश’ उपन्यास को दस लेखकों ने मिलकर लिखा था। यह प्रयोग पूरी तरह विफल रहा। हालांकि, ‘एक इंच मुस्कान’ में मन्‍नू भंडारी और राजेंद्र यादव की भाषा-शैली और नज़रिया बिल्‍कुल अलग है। एक साक्षात्‍कार में मन्‍नू भंडारी ने बताया था कि लेकिन वे मुख्य रूप से महिला पात्र पर केंद्रित रही और राजेन्द्र पुरूष पात्र पर। इस दुखांत प्रेमकथा पर दोनों ने मिल बांट कर काम किया।

‘आपका बंटी’ हिंदी साहित्य में मील का पत्थर माना जाता है

1970 में प्रकाशित दूसरा उपन्यास ‘आपका बंटी’ मन्‍नू भंडारी का परिचय उपन्‍यास बन गया। इसमें उन्‍हों ने एक बच्चे की आंखों के माध्यम से एक विवाह के टूटने जाने और उसके प्रभाव को चित्रित किया है। शकून और उसके बेटे बंटी प्रतीक चरित्र बन गए हैं। बंटी में उन बच्‍चों के मनोभावों को पढ़ा जा सकता है जिनके माता-पिता तलाक ले कर दूसरा विवाह कर लेते हैं। हिंदी साहित्‍य में बाल मनोविज्ञान की इतनी गहरी समझ वाला दूसरा उपन्‍यास मिलना मुश्किल हैं।यही कारण हैं कि इस उपन्यास को ‘हिंदी साहित्य में मील का पत्थर’ माना जाता है।

आपको उनकी आत्मकथा पढ़नी चाहिए

यह बहुत सामान्‍य बात नहीं है कि मन्‍नू भंडारी की ज्यादातर कहानियां लैंगिक असमानता से जुड़ी हैं। पाठकों को झकझोर देने वाले इस लेखन के पीछे उनका भोगा हुआ यथार्थ है। मन्‍नू भंडारी की रचनाओं के चरित्र ऐसे क्‍यों हैं यह समझने के लिए उनके आत्‍मकथ्‍य ‘एक कहानी यह भी’ को पढ़ना चाहिए। इस आत्मकथ्य में वे पड़ताल करती हैं कि पिता के अनजाने-अनचाहे किए गए व्यवहार ने उनके भीतर किन ग्रंथियों को जन्म दे दिया।

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