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kadaknath Chicken: सर्दी आते ही दूसरे राज्यों से आई कड़कनाथ की भारी डिमांड, केरल-तमिलनाडु से लोग कर रहे ऑर्डर

kadaknath Chicken: सर्दी आते ही दूसरे राज्यों से आई कड़कनाथ की भारी डिमांड, केरल-तमिलनाडु से लोग कर रहे ऑर्डर kadaknath-chicken-there-is-a-huge-demand-for-kadaknath-from-other-states-as-soon-as-winter-arrives-people-are-ordering-from-kerala-tamil-nadu

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Bansal News
kadaknath Chicken: सर्दी आते ही दूसरे राज्यों से आई कड़कनाथ की भारी डिमांड, केरल-तमिलनाडु से लोग कर रहे ऑर्डर

ग्वालियर। प्रदेश समेत पूरे देश में गुलाबी ठंड ने दस्तक दे दी है। सर्दी बढ़ते ही मप्र के कड़कनाथ मुर्गे की डिमांड भी बढ़ गई है। ठंड बढ़ते ही कड़कनाथ की मांग दूसरे राज्यों से तेजी से बढ़ने लगी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मध्य प्रदेश के साथ ही देश के कई अन्य राज्यों जैसे केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी कड़कनाथ मुर्गे की मांग काफी ज्यादा बढ़ गई है। बता दें कि कड़कनाथ मुर्गा मूलरूप से मप्र के झाबुआ में मिलता है। इसकी कीमत भी सामान्य मुर्गों के मुकाबले काफी ज्यादा होती है। क्योकि इसमें प्रोटीन की मात्रा बेहद ज्यादा पायी जाती है। साथ ही इसकी हड्डियां और मांस का कलर भी अलग होता है। जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है। आमतौर पर अगर आप इसे बाजार में लेने जाते हैं, तो इसकी कीमत 900 से 1500 रुपये किलों तक होती है।

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भारत के अलावा कहीं और नहीं पाया जाता
यह मुर्गा एक दुर्लभ प्रकार का मुर्गा है। जो भारत के अलावा कहीं और नहीं पाया जाता है। काले रंग की वजह से इस मुर्गे को स्थानीय भाषा में कालीमासी भी कहा जाता है। जानकार मानते हैं कि दूसरी प्रजातियों के मुकाबले यह मुर्गा अधिक स्वादिष्ट, पौष्टिक, सेहतमंद और औषधीय गुणों से भरपूर होता है। समान्य मुर्गों में जहां 18-20 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है, जबकि कड़कनाथ मुर्गे में करीब 25 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है।

झाबुआ के आदिवासी इस मुर्गे को काफी पवित्र मानते हैं
कड़कनाथ मुर्गे के 3 प्रजाति मिलते हैं। इनमें जेट ब्लैक गोल्डन ब्लैक और पेसिल्ड ब्लैक शामिल हैं। इनका वजन 1.8 किलों से 2.0 किलो तक होता है। गौरतलब है कि कुछ सालों पहले तक कड़कनाथ मुर्गे को मध्य प्रदेश के झाबुआ और छत्तीसगढ़ के बस्तर में रहने वाले आदिवासी ही पालते थे और इन्हें काफी पवित्र माना जाता था। आदिवासी समाज के लोग इस मुर्गे को दीपावली के बाद देवी के सामने बलि देते थे और फिर इसे खाने का रिवाज था। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा इसलिए किया जाता था क्योंकि इन्हें तैयार होने में टाइम लगता है।

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