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जानना जरूरी है: जानिए कौन हैं हरेकला हजब्बा, पद्म श्री पुरस्कार को लेकर क्यों हैं चर्चा में?

जानना जरूरी है: जानिए कौन हैं हरेकला हजब्बा, पद्म श्री पुरस्कार को लेकर क्यों हैं चर्चा में? Janna Zaroori Hai: Know who is Harekala Hajba, why is she in discussion about Padma Shri award? nkp

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Bansal Digital Desk
जानना जरूरी है: जानिए कौन हैं हरेकला हजब्बा, पद्म श्री पुरस्कार को लेकर क्यों हैं चर्चा में?

नई दिल्ली। सोमवार, 8 नवंबर को राष्ट्रपति भवन में पद्म पुरस्कार समारोह का आयोजन किया गया। इस दौरान 73 नागरिकों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। जिसमें 4 लोगों को पद्म विभूषण, 8 लोगों को पद्म भूषण और 61 लोगों को पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया गया। हालांकि, इस दौरान अवॉर्ड पाने वालों में से एक नाम काफी सुर्खियों में है। ये हैं कर्नाटक के रहने वाले हरेकला हजब्बा (Harekala Hajabba)। जिन्हें राष्ट्रपति ने भारत का चौथा सबसे प्रमुख नागरिक सम्मान पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया है।

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हजब्बा चर्चा में क्यों हैं?

दरअसल, जब हरेकला हज्बा को राष्ट्रपति ने पद्म श्री पुरस्कार देने के लिए बुलाया तो वह नंगे पांव राष्ट्रपति के पास पुरस्कार लेने गए। अब इस समारोह की तस्वीरें वायरल हो रही हैं। सोशल मीडिया पर लोग उनके जज्बे को सलाम कर रहे हैं। आइए जानते हैं कौन हैं हरेकला हज्बा और क्यों उन्हें इस अवॉर्ड से नवाजा गया है?

पेशे से फल बचते हैं

हरेकाला हजब्बा, कर्नाटक के रहने वाले हैं और पेशे से फल बेचते हैं। विशेष रूप से, वे संतरे से बचने के लिए जाने जाते हैं। हजब्बा कर्नाटक में दक्ष‍िण कन्नड़ा के गांव न्यू पाड़ापू में रहते हैं। 68 वर्षीय हजब्बा ने अपना बचपन अत्यधिक गरीबी में बिताया, जिसके कारण वह कभी स्कूल नहीं जा सके। उन्हें स्कूल न जाने का गम हमेशा सताता था। ऐसे में उन्होंने फैसला किया कि वह खुद तो स्कूल नहीं जा पाए। लेकिन, अब वे अपनी कमाई के पैसे से एक स्कूल बनाएंगे ताकि कोई और गरीब बच्चा स्कूल से वंचित न रहे।

पूरी कमाई स्कूल में लगा दी

उन्होंने अपनी पूरी कमाई स्कूल बनाने में लगा दी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एक बार हरेकाला जब संतरा बेच रहे थे, तो उनसे एक विदेशी ने अंग्रेजी में फल का दाम पूछा, अंग्रेजी नहीं आने के कारण उन्होंने रेट नहीं बताया, लेकिन इस वाक्ये ने उन्हें अंदर से असहाय महसूस करा दिया। इसके बाद उन्होंने तय किया कि मैं अब अपने गांव में स्कूल खोलूंगा ताकि गांव के बच्चों को इस स्थिति का सामना न करना पड़े। उन्होंने स्कूल बनाने में अपनी पूरी जमापूंजी लगा दी।

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पहले गांव में एक भी स्कूल नहीं था

हरेकला हजब्बा के गांव नयापड़ापु में पहले स्कूल नहीं था। उन्होंने पैसे बचाकर सबसे पहले स्कूल खोला। जैसे-जैसे छात्रों की संख्या बढ़ती गई, उन्होंने कर्ज भी लिया और बचत का इस्तेमाल कर स्कूल के लिए जमीन खरीदी। हर दिन 150 रुपये कमाने वाले इस व्यक्त‍ि के जज्बे ने ऐसा जादू किया कि मस्ज‍िद में चलने वाला स्कूल आज प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज के तौर पर अपग्रेड होने की तैयारी कर रहा है।

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