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JANMASHTAMI 2021 : 300 वर्ष पुराना है मंदिर, सिर्फ झूला उत्सव के लिए बाहर आती है श्यामवर्ण प्रतिमा

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Preeti Dwivedi
JANMASHTAMI 2021 : 300 वर्ष पुराना है मंदिर, सिर्फ झूला उत्सव के लिए बाहर आती है श्यामवर्ण प्रतिमा

सागर। श्रीकृष्ण का  JANMASHTAMI 2021 नाम सुनते ही मथुरा वृंदावन स्वत: ही जुबान पर आ जाता है। लेकिन इसी कड़ी में एक मंदिर है एमपी के सागर शहर का। जहां करीब एक किलो मीटर के दायरें में 10 से 15 श्रीकृष्ण मंदिर हैं। इन्हीं मंदिरों में से एक हैं श्रीदेवअटल बिहारीजी मंदिर। जहां की खास बात यह है कि इधर विराजमान ठाकुरजी की प्रतिमाओं में से उनकी श्याम वर्ण प्रतिमा को केवल झूला उत्सव के समय ही बाहर निकाला जाता है। जन्माष्टमी उत्सव पर मंदिर में सभी श्रृद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। मंदिर का इतिहास भी करीब 300 वर्ष पुराना है।
आइए जानते हैं मंदिर से जुड़ी कुछ और विशेष बातें।

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स्वयं आए थे भगवान श्रीकृष्ण
ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण को यहां JANMASHTAMI 2021 स्थापित नहीं किया गया। बल्कि वे स्वयं यहां पधारे थे। मंदिर के पुजारी अमित चाचौंदिया के अनुसार साधुओं की टोली पालकी में बिहारी जी को बिठाकर सागर से गुजर रही थी। रात्रि में विश्राम करने के बाद जब सुबह चलने का समय आया तो बिहारी जी टस से मस नहीं हुए और तभी से वे यहां स्थापित हैं। उनके स्थानांतरित न होने और अटल रहने के कारण ही उनका नाम अटल बिहारी हो गया।

सब हैं एक बराबर
मंदिर की एक अलग बात और भक्तों को एक ही डोरी में पिरोती है। वो है समानता। जी हां। इस मंदिर में किसी को भी वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं दिया जाता। नेता, अभिनेता, जनता, मंत्री कोई भी हो। सबको एक समान तरीके से भगवान के दर्शन का मौका मिलता है। मंदिर के दर्शन के लिए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी पहुंच चुके हैं। लेकिन राजा और महाराजा को आम आदमी की तरह अटल बिहारी के दर्शन करने पड़े।

जानें मंदिर का इतिहास
सागर स्थित श्रीदेव अटल बिहारी मंदिर का इतिहास करीब 300 वर्ष से अधिक पुराना बताया जाता है। मुगलकाल के पतन समय अंग्रेजों द्वारा देश पर कब्जा किया जा रहा था। उसी दौरान साधुओं की टोली बिहारी जी सरकार को लेकर सागर के बड़ा बाजार इलाके में पहुंची थी। एक रात साधुओं के विश्राम करने के बाद जब बिहारी जी सरका की पालकी किसी से उठाई नहीं गई। तो उन्हें इसी स्थान पर स्थापित करने का फैसला लिया गया। और तभी से भगवान को अटल बिहारी जी के नाम से जाना जाने लगा।

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स्थानीय लोग मंदिर को बिहारीजी के मंदिर के नाम से पहचानते हैं। मंदिर के प्रति शहर के लोगों की अटूट आस्था है। जन्माष्टमी और होली पर हालात ये बनते हैं कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़े पैमाने पर पुलिस बल को तैनात करना पड़ता है। सच्चे मन से बिहारी जी से जो भी मनोकामना मांगी जाए, पूरी होती है। स्थानीय लोग बाल रूप में अटल बिहारी जी के दर्शन का दावा भी करते हैं। बच्चों के साथ खेलते हुए अटल बिहारी जी ने स्थानीय लोगों को दर्शन दिए हैं। ऐसा यहां के लोगों का कहना है।

कोविड प्रोटोकॉल के तहत होगा जन्मोत्सव
आज मंदिर में जन्माष्टमी के पूजन के लिए रात 12 बजे अभिषेक होगा। जन्माष्टमी के पर्व के दिन रात में 12 बजे बिहारी जी का अभिषेक होने के बाद उन्हें राज भोग लगाया जाता है। बिहारी जी के दर्शन के लिए सारा शहर रात 12 बजे बड़ा बाजार इलाके की तंग गलियों में उमड़ पड़ता है। लेकिन पिछले 2 साल से कोरोना के चलते जन्माष्टमी पर्व पर असर पड़ा है। इस बार भी कोविड-प्रोटोकॉल के तहत ही यह पर्व मनाया जाएगा।

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