भारत में इस साल होगी कड़ाके की ठंड, जानिए क्या है इसके पीछे की वजह?

Winter in India

नई दिल्ली। भारत में सर्दियों की शुरुआत शरद पूर्णिमा के बाद से मानी जाती है। ऐसे में इस बार कितनी ठंड पड़ेगी इसका एक अनुमान लगाया गया है। अनुमान के मुताबिक इस साल भारत में ठंड ज्यादा ठिठुरन पैदा करने वाली होगी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस बार की ठंड पिछले कुछ वर्षों की तुलना में ज्यादा तीखी होने वाली है। यह अनुमान सुदूर प्रशांत महासागर में हुए मौसम के बदलावों की वजह से लगाया जा रहा है। वैज्ञानिक अपनी भाषा में इस बदलाव को ‘ला नीना’ (Al Nina) प्रभाव बता रहे हैं।

क्या है इस शब्द का मतलब

बतादें कि ‘ला नीना’ एक स्पेनी भाषा का शब्द है, जिसका मतलब छोटी बच्ची होता है। यह एक जटिल प्रक्रिया एन नीनो साउदर्न ऑसिलेशन चक्र का हिस्सा होता है। जो प्रशांत महासागर में घटित होती है। जिसका असर पूरी दुनिया के मौसमों पर होता है। इस प्रक्रिया के दूसरे को अल नीनो कहते है। जसका ला नीना के मुकाबले बिलकुल विपरीत असर होता है।

इस पूरे चक्र में प्रशांत महासागर के भूगोल में अहम भूमिका होती है जो अमेरिका के पर्व से लेकर एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक फैला है। ईएनएसओ प्रशांत महासागर की सतह पर पानी और हवा में असामान्य बदालव लाता है। इसका असर पूरी दुनिया के वर्षण, तापमान और वायु संचार के स्वरूपों पर पड़ता है। जहां ला नीना ईएनएसओ के ठंडे प्रभाव केरूप में देखा जाता है, वहीं अल नीनो गर्मी लाने वाले प्रभाव के रूप में देखा जाता है।

प्रशांत महासागर का ठंडा होना

दोनों ही प्रभाव प्रशांत महासागर की सतह के सामान्य तापमानों में प्रभावी असमान्यता ला देते हैं। ला नीना में प्रशांत महासगर की गर्म पानी की सतह पर हवा पश्चिम की ओर बहती है, जब गर्म पानी में गतिविधि होती है तो ठंडा पानी सतह तक आता है। इससे पूर्वी प्रशांत सामान्य से ज्यादा ठंडा हो जाता है। वहीं ला नीना प्रभाव वाले साल में हवा सर्दीयों में ज्यादा तेज बहती है जिससे भूमध्य रेखा और उसके पास का पानी सामान्य से ठंडा हो जाता है। इसी वजह से महासागर का तापमान पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित कर बदल देता है। भारत में भारी बारिश वाला मानूसन, पेरु और इक्वाडोर में सूखे, ऑस्ट्रेलिया में भारी बाढ़, और हिंद एवं पश्चिम प्रशांत महासागर उच्च तापमान की वजह ला नीना ही है।

इस साल क्या होगा असर

मालूम हो कि इस बार ला नीना सक्रिय है। ऐसे में इसका असर भारत में लागातार कम तापमान के रूप में नहीं होगा, बल्कि बीच बीच में आने वाली शीत लहर के रूप में होगा। ला नीना और अल नीनो का असर 9 से 12 महीनों के बीच में होता है ये हर दो से सात साल में अनियमित रूप से दोबारा आते हैं। अल नीनो ला नीना से ज्यादा बार आता देखा गया है।

भारत में इसका असर सर्दी के मौसम में ही होता है

भारत में ला नीना का असर देश के सर्दी के मौसम पर होता है। इस मौसम में हवाएं उत्तर पूर्व के भूभाग की ओर से बहती है। जिन्हें उच्च वायुमंडल में दक्षिण पश्चिमी जेट का साथ मिलता है। लेकिन अल नीना के दौरान यह जेट दक्षिण की ओर धकेल दी जाती है। इससे ज्यादा पश्चिमी विक्षोभ होते हैं जिससे उत्तर पश्चिम भारत में बारिश और बर्फबारी होती है। लेकिन ला नीना उत्तर और दक्षिण प में निम्न दबाव का तंत्र बनाता है जिससे साइबरिया की हवा आती है और शीतलहर और दक्षिण की ओर जाती है।

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