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इंदौर में हुकुमचंद मिल मजदूरों का दर्द: तीसरी कैटेगरी के 1100 मजदूर अभी भी मदद से वंचित, डेथ सर्टीफिकेट बना बड़ी चुनौती

Indore Hukumchand Mill Mazdoor: इंदौर की हुकुमचंद मिल के तीसरी कैटेगरी के 1100 से ज्यादा मजदूर परिवारों को दो साल में एक रुपये की भी सहायता नहीं मिली है। अपनों के 70 साल पुराने डेथ सर्टीफिकेट की मांग उनके लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई है।

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BP Shrivastava
Indore Hukumchand Mill Mazdoor

Indore Hukumchand Mill Mazdoor: इंदौर की हुकुमचंद मिल के मजदूरों के लिए सरकार ने मदद का कदम बढ़ाया और इसमें दो कैटेगरी के मजूदारों का भुगतान भी हो चुका है, लेकिन तीसरी कैटेगरी के 1100 से ज्यादा परिवारों को दो साल में एक रुपया भी नहीं मिला है। इन परिवारों के साथ सबसे बड़ी परेशान यह आ रही है कि वे अपनों का 70 साल पहले का डेथ सर्टीफिकेट कहां से लाएं?

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यहां बता दें, 2 साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर इंदौर में आयोजित कार्यक्रम में मजदूरों की बकाया राशि मिलने की प्रक्रिया की शुरुआत वर्चुअली की थी।

[caption id="attachment_790922" align="alignnone" width="969"]publive-image सीएम डॉ. मोहन यादव दो साल पहले हुकुमचंद मिल मजदूरों की बकाया राशि का चेक देते हुए।[/caption]

कार्यक्रम में सीएम डॉ. मोहन यादव ने परिसमापक को 224 करोड़ रुपए का चेक सौंपा था। ताकि मजदूर परिवार को बड़ी राहत मिल सके। यह राशि वितरण के लिए तीन कैटेगरी बनाई गई थी...

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  • पहली कैटेगरी उन मजदूरों की है जो जीवित हैं।
  • दूसरी कैटेगरी वह है जिनमें मजदूरों का निधन हो गया है और वारिस पत्नी है।
  • तीसरी कैटेगरी में मजदूर और पत्नी दोनों का निधन हो गया है और बकाया राशि थर्ड पार्टी यानी बेटा-बेटी को मिलना है।

मांगा जा रहा है डेथ सर्टीफिकेट और राशन कार्ड

हुकुमचंद मिल के मजदूरों के वारिश परिवारों में एक तरफ तो कोई बीमार है, वहीं दूसरी तरफ किसी के घर शादी की तैयारियां चल रही हैं। बकाया राशि न मिलने का कारण दस्तावेजों में उलझन है। जैसे कि कई साल पहले जिनकी मां (वारिस) का निधन हो गया, उनसे मृत्यु प्रमाणपत्र मांगा जा रहा है। इसके अलावा, सालों पुराना राशन कार्ड भी लाने के लिए कहा गया है, जिसमें भाई-बहन के नाम दर्ज हों।

कई परिवारों में पिता और मां के गुजर जाने के बाद बेटी ही वारिस होती है, लेकिन उनकी भी शादी कई साल पहले हो चुकी है। उनसे पति के नाम और सरनेम वाला प्रमाण नहीं, बल्कि पिता के नाम का प्रमाण लाने के लिए कहा जा रहा है।

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इन वजहों से वे पिछले 2 साल से परिसमापक कार्यालय और हुकुमचंद मिल के चक्कर काट रहे हैं। उन्हें पैसों की बहुत जरूरत है, क्योंकि किसी के परिवार में गंभीर बीमारी है तो किसी के यहां शादी की तैयारी है। कुछ को बच्चों की पढ़ाई के लिए भी पैसे चाहिए।

परिसमापक की लम्बी छुट्‌टी से मामले लंबित

2 साल में कई लोग चक्कर लगाते-लगाते थक गए हैं। पहले से ही आर्थिक तंगी झेल रहे ये लोग अब अपने काम से छुट्टी लेकर चक्कर काट रहे हैं। लेकिन, ज्यादातर समय परिसमापक की लंबी छुट्टी या अनुपलब्धता के कारण मामला आगे नहीं बढ़ पा रहा है।

[caption id="attachment_790925" align="alignnone" width="967"]publive-image यह हुकुमचंद मिल का परिसमापक कार्यालय है। जहां भुगतान के लिए मजदूरों के परिवार चक्कर लगा रहे हैं।[/caption]

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स्क्रूटनी के बाद ही किया गया था विज्ञापन

दिलचस्प बात यह है कि तीसरी श्रेणी (जहां माता-पिता दोनों का निधन हो चुका है) के 1100 से ज्यादा वारिसों के दस्तावेजों की स्क्रूटनी दिसंबर 2023 से शुरू हो गई थी। इसके बाद 6 सितंबर 2024 को इस संबंध में अखबारों में 800 वारिसों की सूची भी प्रकाशित की गई। इसका मतलब है कि इनके सभी दस्तावेज सही और चेक किए जा चुके हैं।

थर्ड पार्टी श्रमिकों को सबसे ज्यादा मुश्किल

हुकुमचंद मिल के बंद हुए तीन दशक से भी ज्यादा वक्त हो चुका है, लेकिन इसके पूर्व कर्मचारियों और उनके परिजनों की परेशानियां अभी खत्म नहीं हुई हैं।

हुकुमचंद मिल मजदूर समिति के अध्यक्ष नरेंद्र श्रीवंश ने बताया कि मिल 12 दिसंबर 1991 को बंद हुई थी, उस समय यहां 8595 मजदूर और कर्मचारी कार्यरत थे। मिल पर उस समय 280 करोड़ रुपए की लेनदारी थी।

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मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद कुछ राहत

25 दिसंबर 2023 को मुख्यमंत्री द्वारा 224 करोड़ रुपए का चेक सौंपा गया था, जिससे अब तक करीब 2850 जीवित श्रमिकों को बकाया भुगतान किया जा चुका है। इसके अलावा, करीब 1100 दिवंगत श्रमिकों की पत्नियों को भी उनका हिस्सा मिल चुका है।

थर्ड पार्टी मामलों में सबसे ज्यादा अड़चन

सबसे ज्यादा परेशानी उन परिवारों को हो रही है, जिन्हें 'थर्ड पार्टी' की श्रेणी में रखा गया है। जैसे कि जिन श्रमिकों के माता-पिता का निधन हो चुका है और वारिस के रूप में अब बेटी या अन्य परिजन दावेदार हैं। ऐसे मामलों की संख्या भी 1100 से अधिक बताई जा रही है।

दस्तावेजों की जटिल मांगें बढ़ा रहीं समस्या

श्रीवंश ने बताया कि अखबारों में प्रकाशित नोटिस में यह कहा गया है कि वारिस संबंधी आपत्तियों को निपटाने के लिए दस्तावेज जमा किए जाएं, लेकिन वर्षों पुराने दस्तावेज जैसे पुराना राशन कार्ड, बीमा कार्ड, निधन प्रमाण पत्र जैसी चीजें मांगना आम जनता के लिए बहुत कठिन है।

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बेटियों के लिए बन रही मुश्किल स्थिति

विशेषकर उन बेटियों के लिए समस्या और भी जटिल है, जिनकी शादी को 40-50 साल हो चुके हैं। उनसे पति के नाम का नहीं, बल्कि पिता के नाम से बना पुराना प्रमाणपत्र मांगा जा रहा है, जो आज उपलब्ध करा पाना आसान नहीं है।

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