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Diwali 2025 kab Hai, tithi shubh muhurat hindu panchang
Diwali 2025 Kab Hai Date Tithi Muhurat Hindi News: साल का सबसे बड़ा त्योहार दीपावली को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं। घरों में रंग रोगन हो रही है। ऐसे में चलिए जानते हैं इस बार दीपावली कब है। 20 या 21 अक्टूबर दिवाली की सही क्या है। विश्व हिन्दू परिषद और ज्योतिषाचार्य के अनुसार दीपावली की तिथियों में असंजस्य चल रहा है।
दीपावली के पांच दिन के उत्सव
कब है धनतेरस
हिन्दू पंचांग के अनुसार दीपावली पांच दिनी पर्व की शुरुआत धनतेरस के दिन से होती है। इस साल धनतेरस 18 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इस दिन राहुकाल 09:15 एएम से 10:40 एएम तक रहेगा। इस दिन खरीदारी के लिए इस समय का विशेष ध्यान रखें।
कब है रूप चौदस
क्योंकि इसी दिन सूर्योदय में बारस तिथि आएगी। इसके बाद 19 अक्टूबर को रूप चौदस होगा।
कब है धनतेरस
इस साल धनतेरस का पर्व 18 अक्टूबर यानी शनिवार को मनाया जाएगा। हिन्दू पंचांग के अनुसार 18 अक्टूबर को दिन में 1:8 मिनट तक बारस तिथि है इसके बाद तेरस तिथि लगेगी।
कब है दीपावली
इस साल दीपावली का त्योहार 20 अक्टूबर सोमवार को मनाया जाएगा। इस दिन दोपहर 2:42 मिनट तक चौदस तिथि रहेगी। इसके बाद दीपावली का त्योहार आएगा।
दीपावली के पांच दिन के उत्सव
- धनतेरस: 18 अक्टूबर
- रूपचौदस: 19 अक्टूबर
- दीपावली: 20 अक्टूबर
- अन्नकूट: 22 अक्टूबर
- भाईदूज: 23 अक्टूबर
अमावस्या का महत्व
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ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस साल रूप चौदस दोपहर 3:45 बजे तक रहेगी, उसके बाद अमावस्या प्रारंभ होगी। उज्जैन के पंडित के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या को ही दीपावली का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी प्रदोष काल में मां महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था, इसलिए दिवाली का पूजन भी अमावस्या के प्रदोष काल में ही श्रेष्ठ माना जाता है।
पंचांग की अवधारणाएँ
- उज्जैन के पंडितों के अनुसार भारतीय ज्योतिष में पंचांग की दो मुख्य पद्धतियाँ मानी गई हैं – ग्रह लाघव और ग्रह चैत्र।
- ग्रह चैत्र पद्धति दर्शय गणित पर आधारित है।
- ग्रह लाघव सूक्ष्म गणित पर केंद्रित है।
- इसी अंतर के कारण विद्वानों के विचार कई बार अलग-अलग होते हैं। पंचांग के आधार पर ही तिथि और दिन का निर्धारण किया जाता है। इस बार प्रदोष काल की तिथि 20 अक्टूबर को आ रही है, इसलिए उसी दिन दिवाली मनाना सर्वोत्तम माना गया है।
20 अक्टूबर को लक्ष्मी भ्रमण
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ज्योतिषाचार्य के अनुसार, इस बार दिवाली का पर्व 20 अक्टूबर की शाम को मनाया जाएगा। सूर्योदय और सूर्यास्त का समय हर स्थान पर अलग-अलग होने से दिवाली के पूजन का समय स्थानीय पंचांग और विद्वानों से पूछकर ही तय करना चाहिए।
उन्होंने बताया कि धर्मशास्त्र में इस विषय पर दो मत प्रचलित हैं –
धर्म सिंधु: यदि दो दिन प्रदोष काल में तिथि आती है तो पहली तिथि को ही लक्ष्मी पूजन करना चाहिए।
पुरुषार्थ चिंतामणि: यदि अमावस्या दो दिन तक रहे और दूसरे दिन प्रदोष काल में थोड़ी भी अवधि (कम से कम 24 मिनट) मिले तो पूजन अगले दिन करना श्रेष्ठ माना गया है।
इस वर्ष माता लक्ष्मी का भ्रमण होने के कारण अमावस्या की रात यानी 20 अक्टूबर को ही दीपावली का पर्व मनाना उचित बताया गया है।
क्या कहते हैं ज्योतिषाचार्य
20 अक्टूबर को मनाया जाएगा दीपावली का त्योहार
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ज्योतिषाचार्य पंडित रामगोविंद शास्त्री के अनुसार इस बार दीपावली का त्योहार 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा। उसका कारण अमावस तिथि का समय है। दरअसल इस बार अमावस्या तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 2:42 पर आएगी जो दूसरे दिन सूर्योदय तक रहेगी। चूंकि दीपावली का त्योहार रात्रिकालीन पर्व है। यानी मां लक्ष्मी की पूजा रात में होती है इसलिए दीपावली 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी।
भौगोलिक स्थिति और तिथि का अंतर
तिथि की अवधि निश्चित नहीं होती। यह सामान्यतः 55 से 65 घटियों के बीच बदलती रहती है। धर्मशास्त्र के अनुसार वर्ष चार प्रकार के बताए गए हैं – चंद्र वर्ष, सावन वर्ष, सौर वर्ष और बृहस्पति वर्ष।
पर्व अधिकतर चंद्र वर्ष के अनुसार मनाए जाते हैं, जिसकी अवधि लगभग 354 दिन की होती है। चंद्र वर्ष की तिथियाँ स्थिर न होने के कारण भारत के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में दिवाली की तिथियों और समय में थोड़ा अंतर आ जाता है।
पिछले साल भी था मतभेद
पिछले वर्ष भी दिवाली कब मनाई जाए, इसको लेकर ज्योतिषाचार्यों के बीच असमंजस की स्थिति बनी थी। इंदौर में हुई ज्योतिष एवं विद्वत परिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि दीपावली 1 नवंबर को मनाई जाए, जबकि उज्जैन के ज्योतिषाचार्यों ने शास्त्रों के आधार पर 31 अक्टूबर को ही सही तिथि माना था।
31 अक्टूबर की शाम 4:03 बजे से अमावस्या की शुरुआत हुई थी, जबकि 1 नवंबर को अमावस्या शाम 5:38 बजे तक रही और उसी दिन सूर्यास्त 5:46 बजे हुआ। चूंकि दीपावली का मुख्य पूजन प्रदोष काल और रात्रि में ही संपन्न होता है, इसलिए अमावस्या वाले दिन यानी 31 अक्टूबर को ही दीपावली का पर्व मनाना उचित ठहराया गया था।
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