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MP पुलिस को SC की फटकार: पुलिस कस्टडी में मौत का केस, 10 महीने में कोई गिरफ्तारी नहीं, SC ने कहा-अपने अधिकारी को बचा रहे

guna deva pardhi death case: मध्य प्रदेश के गुना में पुलिस कस्टडी में युवकी की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी आपत्ति जताई है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को बचाने की कोशिश की जा रही है और अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

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Vikram Jain
MP पुलिस को SC की फटकार: पुलिस कस्टडी में मौत का केस, 10 महीने में कोई गिरफ्तारी नहीं, SC ने कहा-अपने अधिकारी को बचा रहे
हाइलाइट्स
  • गुना में युवक की पुलिस कस्टडी में हुई मौत का मामला
  • सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश पुलिस को लगाई फटकार
  • कोर्ट ने कहा- पुलिस अधिकारियों को बचाने की कोशिश कर रहा राज्य
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guna deva pardhi custodial death case: पुलिस कस्टडी में युवक की मौत के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (29 अप्रैल) मध्य प्रदेश पुलिस के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस हिरासत में युवक की मौत होने के मामले में 10 महीने तक कोई भी गिरफ्तारी नहीं होना बताता है कि अपने ही अधिकारियों को बचाया जा रहा है। कोर्ट ने आरोपियों की गिरफ्तारी में देरी और मामले की निष्पक्ष जांच की कमी पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

जानें पूरा मामला

दरअसल, मध्य प्रदेश में गुना में 25 वर्षीय युवक देवा पारधी की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। पुलिस ने देवा और उसके चाचा गंगराम को चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का कहना था कि देवा की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई, लेकिन परिवार ने इसे पुलिस की प्रताड़ना से हुई मौत बताया था। मामले में देवा की मां ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

पुलिस पर प्रताड़ना और हत्या का आरोप

याचिका के अनुसार, चोरी के मामले में देवा और उसके चाचा गंगाराम को गिरफ्तार किया गया था। याचिका में आरोप लगाए लगाए गए हैं कि हिरासत के दौरान पुलिस ने देवा को प्रताड़ित किया और उसकी हत्या कर दी। अनुच्छेद 32 दायर की गई इस याचिका में मामले में निष्पक्ष जांच और मामले को सीबीआई या एसआईटी को सौंपने की मांग की गई थी। साथ ही मृतक के चाचा गंगाराम को भी जमानत देने की मांग की गई है, जो मामले में मामले में एकमात्र चश्मदीद गवाह है।

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अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई?

मामले में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने मामले में कहा कि
कहा कि राज्य पुलिस अधिकारियों को बचाने की कोशिश कर रहा है और अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह एक दुखद स्थिति है कि कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। साथ ही कोर्ट गंगाराम को जमानत देने से इनकार करने के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर भी सुनवाई कर रही है।

अदालत में पेश की मजिस्ट्रेट जांच की स्थिति

मामले में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मजिस्ट्रेट जांच की स्थिति को अदालत में स्पष्ट किया। जिसमें बताया कि विचाराधीन दो पुलिस अधिकारियों को लाइन ड्यूटी पर भेजा गया है, तो कोर्ट ने मामले कोई भी गिरफ्तारी नहीं होने पर सवाल उठाए।

ये पक्षपात का बढ़िया उदाहरण...

राज्य का पक्ष सुनने के बाद जस्टिस मेहता ने कहा कि पुलिस हिरासत में मौत के मामले में शानदार प्रतिक्रिया!, पक्षपात का इससे बढ़िया उदाहरण और क्या हो सकता है, यहां अपने ही अधिकारियों का बचाव किया जा रहा है। कोर्ट ने आगे कहा कि क्या अपने आप को न्यायमित्र के रूप में नियुक्त करना चाहते हैं या मामले सीबीआई की जांच किया जाना चाहते हैं? राज्य पुलिस का प्रतिनिधित्व करने के बजाय, हास्यास्पद और अमानवीय दृष्टिकोण।

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पुलिस अधिकारियों को बचाने की हो रही कोशिश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस हिरासत में आदमी की मौत हो जाती है और आपको अपने अधिकारियों को पकड़ने में 10 महीने लगते हैं। राज्य पुलिस अधिकारियों को बचाने की कोशिश कर रहा है और अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह एक दुखद स्थिति है कि कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है, अधिकारियों को लाइन ड्यूटी पर क्यों और किस कारण से भेजा गया? उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया?

डबल बेंच ने यह भी कहा कि आप 10 महीने से एक भी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर पाए हैं, यह आपकी क्षमता को दर्शाता है। कानून का क्या प्रावधान है जिसके तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है? जस्टिस मेहता ने टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि राज्य ने यह कहकर बोझ को स्थानांतरित करने की कोशिश की कि मृतक के शरीर में कुछ पदार्थ पाया गया था। "क्या इससे बेहतर कवर-अप कानून हो सकता है?"

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कोर्ट ने कहा- थम नहीं रही हिरासत में हिंसा

इस दौरान जस्टिस मेहता ने मृतक की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी पढ़ी, जिसके बाद उन्होंने कहा कि पुलिस हिरासत में 25 साल के लड़के की मौत हो जाती है और मेडिकल ज्यूरिस्ट को शरीर पर एक भी चोट नहीं दिखाई दी, इसके बाद आप कहते हैं कि युवक की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है। लड़के पूरे शरीर पर चोट के निशान। उन्होंने आगे कहा कि देश में यह दुखद स्थिति है कि इस कोर्ट के फैसलों के बाद भी पुलिस हिरासत में हिंसा थम नहीं रही है। अपराधी खुले में घूम रहे हैं और आप एकमात्र गवाह को खत्म करने की कोशिश करते हैं।

गंगाराम को सेंट्रल जेल में स्थानांतरित करने के आदेश

साथ ही वकील ने अदालत को बताया कि इस मामले में गंगाराम एकमात्र चश्मदीद गवाह हैं, जिन्हें पुलिस द्वारा परेशान किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने गंगराम की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्हें ग्वालियर सेंट्रल जेल में स्थानांतरित करने का आदेश दिया है।

हिरासत में रहना ही सुरक्षा के लिए बेहतर

जस्टिस मेहता ने टिप्पणी की,"वर्तमान में, हिरासत में रहना आपके अपने स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए बेहतर है। जब वह बाहर आता है, तो उसे एक लॉरी द्वारा कुचल दिया जाता है और आपको पता भी नहीं चलेगा। यह एक दुर्घटना होगी और आप एक भी गवाह खो देंगे। उदाहरण असामान्य नहीं हैं ... हमने इस आधार पर जमानत याचिकाओं को भी खारिज कर दिया है कि आरोपी की जान को खतरा है। यह हमेशा बेहतर होता है। आप ऐसे उदाहरण देखेंगे कि जिस क्षण अभियुक्त जमानत पर बाहर आया, उसे दूसरे पक्ष द्वारा हटा दिया गया। यह जोखिम न लें। इसे अदालत पर छोड़ दें, "​

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