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MP News: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने जन्माष्टमी के अवसर पर अशोकनगर के चंदेरी में एक जनसभा को संबोधित किया। उन्होंने बुनकर पार्क में हिंदू और मुसलमानों के बीच मिलजुलकर काम करने की मिसाल पेश की। साथ ही, बुनकरों के लिए कई सौगातों की घोषणा भी की। मुख्यमंत्री भगवान कृष्ण का आशीर्वाद लेने के लिए चंदेरी पहुंचे थे, जहां उन्होंने बुनकर पार्क में श्रमिकों से बातचीत की और उनके साथ समय बिताया। इसके साथ ही सीएम मोहन यादव ने ध्रुपद गायक बैजू बावरा की समाधी स्थल पर पहुंचकर पुष्पांजलि अर्पित की।
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चंदेरी को तीर्थ स्थल घोषित किया जाएगा
जनसभा में प्रभारी मंत्री राकेश शुक्ला ने चंदेरी में भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव हर साल मनाने की मांग की। मुख्यमंत्री ने स्थानीय विधायक की मांग पर चंदेरी के लिए कई घोषणाएं कीं। उन्होंने कहा कि चंदेरी को पर्यटन की दृष्टि से तीर्थ नगरी घोषित किया जाएगा, लक्ष्मण मंदिर में गीता भवन बनाया जाएगा और साहसिक कार्य करने वाली चंदेरी की बेटी मुस्कान को 4 लाख रुपये देने की घोषणा की।
सीएम ने बैजू बावरा को बताया संगीत की प्रेरणा
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सीएम ने एक्स चंदेरी में बैजू बावरा की समाधि पर श्रद्धासुमन अर्पित किए। जानकारी देते हुए उन्होंने एक्स पर पोस्ट कर लिखा कि चंदेरी में आज मध्यप्रदेश के रत्न, महान गायक श्री बैजू बावरा जी की समाधि स्थल पर पहुंचकर श्रद्धासुमन अर्पित किए। संगीत के लिए समर्पित आपका जीवन भावी पीढ़ियों को संगीत की साधना के लिए प्रेरित करता रहेगा।
कौन थे बैजू बावरा

बैजू बावरा का असली नाम बैजनाथ मिश्र था. वे जब संगीत की धुन छेड़ते थे तो प्रकृति झूम उठती थी. बैजू बावरा का जन्म गुजरात के चांपानेर गांव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था लेकिन वे गुरू हरिदास के यहां पढ़ने ग्वालियर आए। बाद में वे राजा मानसिंह के दरबार के गायक और उनकी संगीत नर्सरी के आचार्य बने थे। अकबर के दरबार में वे संगीत सम्राट तानसेन को भी हरा चुके थे।
भरे दरबार में तानसेन को हराया

अकबर के दरबार में संगीत की एक प्रतियोगिता में तानसेन और बैजू के बीच मुक़ाबला हुआ था इस प्रतियोगिता में तानसेन ने टोड़ी राग गाया, जिससे हिरणों का झुंड इकट्ठा हुआ था और तानसेन ने इसमें से एक हिरण के गले में हार डाल दिया था संगीत खत्म होते ही हिरण जंगल में भाग गये थे। जवाब में बैजू बावरा ने राग 'मृग रंजनी टोड़ी गाया, जिसके प्रभाव से हिरण फिर वापस आ गया और तानसेन का हार भी वापस आ गया। इसके बाद बैजू ने 'मालकोस’ राग गाकर पत्थर पिघला दिया और अपना तानपुरा इसमें फेंका। इसके बाद पत्थर के ठंडा होते ही तानपुरा उसमें गढ़ा रह गया। बैजू ने उस तानपुरे को पत्थर में निकालने के लिए कहा पर तानसेन ऐसा नहीं कर सके और उन्होंने हार मान ली।
बैजनाथ ऐसे बने बैजू बावरा
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बैजू जब युवा हुए तो चंदेरी की रहने वाली कलावती नाम की युवती से उनको प्रेम हो गया था। बैजू युवती के प्रेम में दिन दिन भर संगीत रचते और गाते फिरते थे। बैजू के लिए उनकी प्रेयसी प्रेरणास्रोत बन गई। बैजू कलावती के प्यार में गली गली पागलों की तरह गाते फिरते थे। जिसके बाद लोग उन्हें बैजू बावरा कहने लग गए। उनके जीवन पर बॉलीवुड फिल्म बैजू बावरा (Baiju Bawra) भी काफी लोकप्रिय है इस फिल्म के गाने लोगों का दिल छू लेते हैं।
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