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अनुकंपा नियुक्ति अधिकार नहीं बल्कि तात्कालिक सहायता: 21 साल पुराने दावे पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दिया अहम फैसला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 21 साल पुराने अनुकंपा नियुक्ति के दावे को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति कोई अधिकार या विरासत में मिलने वाला पद नहीं है।

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Harsh Verma
Bilaspur High Court

Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ में अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक अहम कानूनी फैसला सामने आया है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 21 साल पुराने मामले में दायर याचिका को खारिज करते हुए साफ कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति कोई कानूनी अधिकार या पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलने वाली विरासत नहीं है। यह केवल एक सामाजिक कल्याणकारी व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक राहत देना है।

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जस्टिस एके प्रसाद की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एके प्रसाद ने टिप्पणी की कि अनुकंपा नियुक्ति का मकसद वर्षों बाद रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि कर्मचारी की मृत्यु के तुरंत बाद परिवार को संकट से उबारना है। अदालत ने कहा कि इतने लंबे अंतराल के बाद किया गया दावा न तो नीति के अनुरूप है और न ही कानून के।

क्या है पूरा मामला

यह मामला रायगढ़ जिले के घरघोड़ा क्षेत्र से जुड़ा है। यहां के निवासी निजेश चौहान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसके पिता शिक्षा विभाग में मंडल संयोजक के पद पर कार्यरत थे और उनका निधन 19 फरवरी 2005 को हो गया था।

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नाबालिग होने और पारिवारिक विवाद का तर्क

निजेश चौहान ने अदालत को बताया कि पिता की मृत्यु के समय वह नाबालिग था। इसके अलावा उसके पिता की दो पत्नियां थीं, जिस वजह से अनुकंपा नियुक्ति को लेकर पारिवारिक विवाद खड़ा हो गया। यह विवाद बाद में सिविल कोर्ट में समझौते के जरिए सुलझाया गया। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इसी कारण आवेदन करने में देरी हुई।

14 साल बाद किया गया आवेदन

राज्य के शिक्षा विभाग छत्तीसगढ़ ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता ने वयस्क होने के बाद वर्ष 2019 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था, जो कि पिता की मृत्यु के करीब 14 साल बाद था। विभाग ने तय समय सीमा का हवाला देते हुए आवेदन को खारिज कर दिया।

इससे पहले भी याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत के निर्देश पर विभाग ने मामले पर पुनर्विचार किया, लेकिन 16 जनवरी 2023 को फिर से देरी के आधार पर दावा नामंजूर कर दिया गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने एक बार फिर हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार की नीति के अनुसार विशेष परिस्थितियों में भी अनुकंपा नियुक्ति के लिए अधिकतम 5 साल की सीमा तय है। नाबालिग होने या पारिवारिक विवाद जैसे कारण इस समय सीमा को अनिश्चित काल तक बढ़ाने का आधार नहीं बन सकते। अदालत ने कहा कि यदि इतने लंबे समय बाद भी अनुकंपा नियुक्ति दी जाए, तो यह नीति के उद्देश्य को ही विफल कर देगा।

अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि 14 से 21 साल बाद किया गया दावा न केवल नीति के खिलाफ है, बल्कि कानून की भावना के भी विपरीत है। अनुकंपा नियुक्ति को नियमित भर्ती का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

अनुकंपा नियुक्ति पर नजीर

इस फैसले को अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि अनुकंपा नियुक्ति का लाभ केवल तय समय और वास्तविक संकट की स्थिति में ही दिया जा सकता है।

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