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Chhattisgarh News: भ्रष्टाचार के एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने रिटायर्ड छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट जज जस्टिस आई.एम. कुद्दूसी (Justice I.M. Quddusi) को जारी की गई नोटिस को रद्द करते हुए साफ शब्दों में कहा कि CrPC की धारा 91 का इस्तेमाल किसी आरोपी या गवाह से उसकी निजी जानकारी जबरदस्ती हासिल करने के लिए नहीं किया जा सकता।
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि धारा 91 का मकसद केवल पहले से मौजूद दस्तावेज़ या वस्तुएं जांच एजेंसी के सामने पेश करवाना है। इसका उद्देश्य यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को अपनी याददाश्त से जानकारी निकालकर लिखित रूप में देने के लिए मजबूर किया जाए। अदालत ने माना कि ऐसा करना कानून की मंशा के खिलाफ है और इससे आरोपी के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं।
क्यों नहीं लागू होगा ‘टेस्टिमोनियल कम्पल्शन’
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कोर्ट ने कहा कि यदि किसी आरोपी को अपनी निजी जानकारी देने के लिए बाध्य किया जाता है, तो यह ‘टेस्टिमोनियल कम्पल्शन’ की श्रेणी में आता है। इससे व्यक्ति के खिलाफ खुद को दोषी ठहराने का खतरा पैदा होता है, जो संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन है। इस अनुच्छेद के तहत किसी भी व्यक्ति को अपने खिलाफ बयान देने या लिखित जानकारी देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, चाहे जांच किसी भी स्तर पर हो।
CBI के पास मौजूद हैं वैकल्पिक कानूनी रास्ते
अदालत ने यह भी साफ किया कि जांच एजेंसी पूरी तरह असहाय नहीं है। यदि किसी जानकारी की जरूरत है, तो CBI धारा 161 CrPC के तहत पूछताछ कर सकती है, जहां आरोपी को चुप रहने का अधिकार होता है। इसके अलावा बैंक, टेलीकॉम कंपनियों और अन्य संबंधित संस्थानों से सीधे रिकॉर्ड भी मंगवाए जा सकते हैं। कोर्ट ने दो टूक कहा कि जांच की सुविधा के नाम पर संवैधानिक सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता।
पुराने फैसलों का दिया गया हवाला
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दिल्ली हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 91 CrPC का प्रयोग सीमित दायरे में ही किया जाना चाहिए। अदालत ने दोहराया कि यह धारा किसी व्यक्ति को अपने ही खिलाफ सबूत देने के लिए मजबूर करने का जरिया नहीं बन सकती।
क्या था पूरा मामला
CBI ने भ्रष्टाचार के एक मामले की जांच के दौरान जस्टिस आई.एम. कुद्दूसी को नोटिस जारी कर उनके मोबाइल नंबर, बैंक खातों का विवरण, ड्राइवर और घरेलू सहायकों की जानकारी मांगी थी। रिटायर्ड जज ने इसे अपने संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए ट्रायल कोर्ट में चुनौती दी। ट्रायल कोर्ट ने CBI के नोटिस को अवैध मानते हुए रद्द कर दिया। इसके बाद CBI ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
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