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बिलासपुर हाईकोर्ट का फैसला: कहा- निजता से ऊपर फेयर ट्रायल, पति-पत्नी विवाद में व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को माना साक्ष्य

बिलासपुर हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के विवाद से जुड़े एक अहम मामले में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को स्वीकार करने की अनुमति दी है। कोर्ट ने कहा कि परिवार न्यायालय को दस्तावेज या डिजिटल सामग्री को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने की विशेष शक्ति है।

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Harsh Verma
Bilaspur High Court

Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट (Bilaspur High Court) ने पति-पत्नी विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पारिवारिक विवादों में न्याय के हित में यदि आवश्यक हो तो इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को रिकॉर्ड में लिया जा सकता है।

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मामले में रायपुर निवासी एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी से तलाक की मांग करते हुए परिवार न्यायालय (Family Court) में याचिका दायर की थी। पति ने अदालत से अनुरोध किया कि पत्नी की अन्य व्यक्तियों के साथ हुई व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाए।

पत्नी ने जताई निजता के उल्लंघन की आपत्ति

पत्नी की ओर से इस आवेदन का विरोध किया गया। उनका कहना था कि इस तरह की निजी चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को अदालत में पेश करना उनके निजता के अधिकार (Right to Privacy) का उल्लंघन है। उन्होंने इसे संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार से जोड़ते हुए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को खारिज करने की मांग की।

हालांकि, परिवार न्यायालय ने पति के आवेदन को मंजूरी दे दी। इसके बाद पत्नी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (Chhattisgarh High Court) का दरवाजा खटखटाया।

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फेयर ट्रायल को दी प्राथमिकता

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद परिवार न्यायालय के आदेश को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि परिवार न्यायालय के पास यह विशेष अधिकार है कि वह मामले के प्रभावी और न्यायपूर्ण निपटारे के लिए किसी भी दस्तावेज या जानकारी को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि फेयर ट्रायल (Fair Trial) का सिद्धांत न्याय व्यवस्था की मूल आत्मा है। यदि किसी साक्ष्य से मामले की सच्चाई सामने आती है, तो उसे केवल निजता के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

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