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बारिश में टापू बने छत्तीसगढ़ के ये 30 गांव: जिंदगी दांव पर लगाकर ग्रामीण लाते हैं राशन; 77 सालों से हैं ऐसे हालात

Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में 2 वक्त के खाने के लिए ग्रामीण उफनती नदी को पार करके राशन लेकर आते हैं।

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aman sharma
बारिश में टापू बने छत्तीसगढ़ के ये 30 गांव: जिंदगी दांव पर लगाकर ग्रामीण लाते हैं राशन; 77 सालों से हैं ऐसे हालात

Chhattisgarh News:छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले (Chhattisgarh News) में भारी बारिश के कारण बीते कुछ दिनों से आम जनजीवन अस्त- व्यस्त हो गया है। भारी बारिश की वजह से हर तरफ नदी-नाले उफान पर है। वहीं, दूसरी ओर तीन से ज्यादा गांव टापू में बदल गए हैं। नदी-नालों का जलस्तर बढ़ने से उस पार रहने वाले ग्रामीणों की रोजमर्रा जिंदगी थम गई हैं। लोगों को रोजमर्रा की चीजें खरीदने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

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ग्रामीणों की काफी लंबे समय से नदी पार करने के लिए एक पुल (Chhattisgarh News) बनाने की मांग कर रहे थे, लेकिन उनकी इस मांग को उच्च अधिकारियों ने एक कान से सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाल दिया। अब ग्रामीणों को भारी बारिश में उन्हें दो वक्त के खाने के लिए भी काफी संघर्ष करना पड़ रहा है।

लोग दो वक्त के खाने के लिए उफनती नदी को जिंदगी दांव पर लगाकर उस पार जा और आ रहे हैं, जिससे उनके परिवार वाले दो वक्त का खाना (Chhattisgarh News) खा सके। यह पूरा मामला छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के भोपालपटनम ब्लॉक में चिंतावागु नदीं पर पुल बनाने के कारण गोरला पंचायत के सैकड़ो ग्रामीणों राशन लाने के लिए जोखिम उठाकर उफनती नदी को पार कर रहे हैं।

उफनती नदी पार करने पर मजबूर ग्रामीण

बता दें कि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत बीपीएल परिवारों को नि:शुल्क चावल पीडीएस की दुकानों पर दिए जाते हैं। मगर भारी बारिश के कारण बस्तर संभाग में बसे ग्रामीणों को यह राशन लेने के लिए कापी मेहनत करनी पड़ती है।

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दरअसल ग्रामीण इन इलाकों में पुल नहीं होने के कारण उफनती नदी को पार करने के लिए काफी मजबूर हैं। यहां पर रहने वाले लोगों को उफनती चिंतावागु नदी को गंज के सहारे पार कर पीडीएस दुकान से राशन लाकर नदी को वैसे ही पार करना पड़ता है।

नदी पार करने के बाद चलते हैं 8 KM

ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के मौसम में राशन के लिए उन्हें काफी परेशानी झेलनी पड़ती है। इस गांव में राश की दुकानें नदी के उस पार संचालित की जाती है, जिसके कारण ग्रामीणों को बहती नदी पार करके राशन लाना पड़ता है और उसके बाद करीब आठ किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि कई बार पीडीएस की दुकान मिनुर गांव में खोले जाने और पुल बनाने के लिए कई बाद आवदेन दे चुके हैं, लेकिन उसके बाद भी उनके पुल की समस्या का समाधान दो दूर की बात है उसपर सुनवाई तक नहीं की गई है, जिसके चलते उन्हें दो वक्त के खाने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ रहा है।

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77 सालों से हैं ऐसे हालात

गांव के एक बुजुर्ग मट्टी चंद्रया का कहना है कि आजादी के 77 वर्षों के बाद भी उनके गांव में कई बार पुल बनाने की मांग की गई है, लेकिन उसके बावजूद यहां पर पुल का निर्माण नहीं किया गया। कई बार उन्होंने अरपनी आंखों के सामने इस नदीं को पार करते ग्रामीणों को अपनी जान गंवाते देखा है, लेकिन सरकार उनकी इस मांग को दरकिनार कर रही है।

15 साल से कर रहे हैं पुल की मांग

जबकि गोरला पंचायत की सरपंच टिंगे चिनाबाई ने जानकारी दी कि वह पिछले 15 वर्षों से चिंतावगु नदी में पुल की मांग करते हुए आ रही है। तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह को वह दो बार और भूपेश बघेल को एक बार आवेदन स्वयं दे चुकी है, लेकिन फिर भी इश नहीं पर पुल बनाने को लेकर सरकार ने अब तक गंभीरता नहीं दिखाई है।

मोटर बोट मांगी पर वो भी नहीं मिली

सरपंच ने बताया कि पुल नहीं बनने की स्थिति में उन्होंने जिला प्रशासन से एक मोटर बोट की मांग की ताकि ग्रामीणों को ऐसे हालातों में कम से कम राशन लाने में परेशानी नहीं हो, लेकिन हैरानी की बात यह है कि हमारी ये मांग भी अभी तक पूरी नहीं की गई, जिसके कारण ग्रामीणों अपनी रोजमर्रा की चीजें और राशन लाने के लिए रोज अपना जीवन दाव पर लगा रहे हैं।

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