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Bhopal AIIMS: भोपाल एम्स पर गड़बड़ी के आरोप, बिना टेंडर अमृत फार्मेसी से दवाएं खरीदीं, 400 की दवाई के लिए दिए 2100 रुपए

Bhopal AIIMS: भोपाल एम्स में कैंसर की दवाओं की खरीदी में गड़बड़ी के गंभीर आरोप सामने आए हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की जांच के अनुसार यह दवा बाकी एम्स से 300-400 रुपए में खरीदी जाती है। वहीं एम्स भोपाल ने इसे 7 गुना अधिक कीमत में खरीदा है।

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Bansal news
Bhopal AIIMS: भोपाल एम्स पर गड़बड़ी के आरोप, बिना टेंडर अमृत फार्मेसी से दवाएं खरीदीं, 400 की दवाई के लिए दिए 2100 रुपए

हाइलाइट्स

  • एम्स भोपाल में दवाओं की खरीद में गड़बड़ी के आरोप।
  • एम्स भोपाल में 7 गुना ज्यादा कीमत में खरीदी गई दवाएं।
  • केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की टीम ने एम्स डायरेक्टर से पूछताछ की।
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Bhopal AIIMS: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) भोपाल पर सस्ते दवाओं की जगह महंगी सप्लाई के गंभीर आरोप लगे हैं। खुलासा हुआ है कि कैंसर की दवा जेमसिटेबिन जो दूसरे एम्स 300-400 रुपए में खरीदते हैं, भोपाल एम्स में यह दवा 2100 रुपए में खरीदी गई। यहां केंद्र सरकार के स्पष्ट नियमों बाद भी दवा खरीदी में जीएफआर 2017 का पालन नहीं हुआ। नियम को दरकिनार कर दवा की सप्लाई अमृत फार्मेसी को दे दी गई। अब गड़बड़ी की शिकायतों के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने गंभीरता दिखाई है। अब यह गंभीर आरोप पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है।

शिकायतों के बाद जांच शुरू

भोपाल एम्स (All India Institute of Medical Sciences Bhopal) में दवा खरीदी में गड़बड़ी के आरोपों के बाद केंद्र सरकार ने जांच शुरू की है। गुरुवार को भोपाल एम्स पहुंची केंद्रीय मंत्रालय की टीम ने जांच की है। टीम ने यहां डायरेक्टर, डिप्टी डायरेक्टर एडमिनिस्ट्रेशन और प्रेसिडेंट से करीब 4 घंटे तक पूछताछ की। टीम ने दस्तावेज देखे और दवाओं की खरीद प्रक्रिया की पूरी जांच की।

सामने आया है कि एम्स में कैंसर की जेम्सिटेबिन दवा, जो आमतौर पर 300 से 400 रुएप में मिलती है, उसे मई तक 2100 रुपए प्रति डोज में खरीदा गया। इन दवाओं को 7 गुना अधिक कीमत में खरीदा है। यह खरीद बिना टेंडर सीधे ‘अमृत फार्मेसी’ से की गई। केंद्र के नियमों के खिलाफ यह पूरी व्यवस्था वर्षों से चल रही थी। अब मंत्रालय इस पूरी प्रक्रिया को केंद्रीकृत करने जा रहा है।

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दवाएं सस्ती रहें इसलिए जरूरी होता है टेंडर

सरकार का नियम है कि अस्पतालों को दवाएं टेंडर प्रक्रिया से खरीदनी होती हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि अलग-अलग कंपनियां अपने-अपने दाम दें और अस्पताल कम कीमत में दवाएं खरीद सकें। लेकिन भोपाल एम्स में इस नियम का पालन नहीं किया गया। यहां सीधे 'अमृत फार्मेसी' से दवाएं खरीदी गईं, जबकि उससे दवा खरीदने की इजाज़त सिर्फ आपात स्थिति (Emergency) में होती है।

कोविड के बहाने बढ़ती गई खरीदी  

कोरोना महामारी के दौरान हालात बिगड़ने पर इमरजेंसी दवाएं अमृत फार्मेसी से मंगवाई गईं। लेकिन बाद में भी यह तरीका जारी रहा। नतीजा ये हुआ कि पहले जहां दवाओं की खरीद करीब 15 लाख रुपये तक होती थी, वह अब बढ़कर 60 करोड़ रुपए तक पहुंच गई। इस दौरान कई दवाएं जरूरत से कहीं ज्यादा कीमत पर खरीदी गईं।

जांच के लिए बाहर जाना पड़ा

एम्स ने जिस कंपनी (HLL) से जांच और लैब की सुविधा ले रखी थी, उसका अनुबंध (agreement) खत्म हो गया। एचएलएल से समझौता खत्म होने से मरीजों पर सीधे असर पड़ा। उन्हें जरूरी और महंगी जांचें बाहर प्राइवेट लैब में करानी पड़ीं। इससे इलाज का खर्च अचानक बहुत बढ़ गया।

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अब आएगी नई व्यवस्था

एम्स प्रबंधन का कहना है कि जल्द ही एक नई केंद्रीकृत जांच प्रणाली लागू की जाएगी। इसके बाद देश के सभी एम्स में एक जैसी जांच सुविधाएं मिलेंगी और जांच का सारा खर्च सीधे मंत्रालय वहन करेगा। फिलहाल मरीजों को जो असुविधा हो रही है, वह अस्थायी (Temporary) है।

आपातकालीन दवा खरीद करोड़ों में पहुंची

एम्स को नियम के अनुसार सिर्फ आपात स्थिति में अमृत फार्मेसी (Amrit Pharmacy) से दवाएं खरीदनी थीं। लेकिन यहां सभी दवाएं अमृत फार्मेसी से खरीदी गईं।

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  • पहले यह खर्च 10–15 लाख रुपए होता था।
  • कोविड काल में 2–3 करोड़ पहुंचा।
  • अब यह खर्च बढ़कर 25 से 60 करोड़ रुपए तक हो गया है।
  • दवाएं मनमानी कीमतों पर खरीदी गईं।

एम्स डायरेक्टर का बयान

एम्स के डायरेक्टर डॉ. अजय सिंह का कहना है कि: "इस जांच से साफ हो जाएगा कि कुछ लोग सिर्फ अपने निजी फायदे के लिए गलत बातें फैला रहे हैं और मरीजों को गुमराह कर रहे हैं।"

भोपाल सांसद ने उठाया था मुद्दा

दरअसल, 15 मई को दिल्ली में हुई स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी की बैठक में भोपाल के सांसद आलोक शर्मा ने इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने बताया कि एम्स में दवाएं बहुत महंगे दामों पर खरीदी जा रही हैं। कमेटी की चेयरपर्सन और केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने जांच का भरोसा दिलाया था, जिसके बाद अब कार्रवाई शुरू हो गई है। साथ ही छह महीनों में मंत्रालय तक 8 से ज्यादा शिकायतें पहुंची थीं। इनमें से एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड से खत्म हुए समझौते से जुड़ी थीं।

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