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Ambedkar Jayanti 2021: छुआछूत के खिलाफ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का संघर्ष

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Bansal Digital Desk
Ambedkar Jayanti 2021: छुआछूत के खिलाफ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का संघर्ष

नई दिल्ली। भारत के संविधान निर्माता बाबा साहब भीम राव आंबेडकर की आज जयंती है। देश 14 अप्रैल को भारत रत्न बाबासाहेब की 130वीं जयंती मना रहा है। ऐसे में आज हम उनके छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष को जानने की कोशिश करेंगे।

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महाभारत काल के बाद देश में छुआछूत का भयंकर रोग लगा

दरअसल, वैदिक काल में कोई छुआछूत या जात पात भारत में नहीं थी। लेकिन महाभारत के युद्ध के बाद देश में छुआछूत का ऐसा भयंकर रोग लगा कि इसने सबकुछ ही-धर्म एवं संस्कृति को छिन्न-भिन्न करके रख दिया। बाबा साहब अंबेडकर बचपन से ही छुआछूत को एक रोग समझते थे और देश के विकास और उत्थान में जाति प्रथा को एक रोड़ा समझते थे। उनकी इस भावना से अनेक सामाजिक कार्यकर्ता और नेता, यहां तक कि जज आदि भी प्रेरित थे। यही कारण है कि भारत सरकार अधिनियम 1919, तैयार कर रही साउथबोरोह समिति के समक्ष, भारत के प्रमुख विद्वान के तौर पर अंबेडकर को गवाही देने के लिए आमंत्रित किया था।

अंबेडकर ने 1919 में आरक्षण की वकालत की थी

इस सुनवाई के दौरान अंबेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिए अलग निर्वाचिका और आरक्षण देने की वकालत की थी। इतना ही नहीं साल 1920 में, बंबई में उन्होंने सप्ताहिक 'मूकनायक' के प्रकाशन की शुरुआत की। यह प्रकाशन जल्द ही पाठकों के बीच लोकप्रिय हो गया, तब अंबेडकर ने इसका इस्तेमाल रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के लिए और भारतीय राजनैतिक समुदाय की आलोचना करने के लिए किया।

क्या था उनका उद्देश्य

बाबा साहब का उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिए काम करना था। अंबेडकर कहा करते थे कि यदि किसी एक जाति का विकास नहीं हुआ तो उसके पतन का दाग सभी जातियों तक पहुंच सकता है, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। बतादें कि बाबा साहब जब सन् 1926 में बंबई विधान परिषद के मनोनीत सदस्य बने तो उन्होंने सन् 1927 में छुआछुत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू किया।

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स्वतंत्रता से पहले समाज को ऊपर उठाने की जरूरत है

उन्होंने इस आंदोलन के जरिए पेयजल के सार्वजनिक संसाधन को समाज के सभी वर्गों के लिए खुलवाने और अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश दिलाने के लिए संघर्ष किया। वे राजनीतिक सुधार से कहीं ज्यादा सामाजिक सुधार को मह्त्व देते थे। यही कारण है कि उन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई में कहा था कि, पहले समाज को ऊपर उठाने की जरूरत है। तब जाकर स्वतंत्रता के लिए युद्ध किया जाए। हालांकि तब कांग्रेस के कई नेता अंबेडकर की इन बातों से नाराज हो गए थे और उन्हें अंग्रेजों का एजेंट बता दिया था। इस पर बाबा साहब ने कहा था कि मेरा कांग्रेस के नेताओं से मतभेद जरूर है, पर मैं अपने देश की स्वतंत्रता का विरोधी नहीं हूं। मैं जरूरत पड़ने पर अपने देश के लिए जान भी दे सकता हूं।

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