यहां दिवाली के बाद होता है मामा कंस का वध, 268 साल पुरानी है परंपरा

यहां दिवाली के बाद होता है मामा कंस का वध, 268 साल पुरानी है परंपरा

शाजापुर/आदित्य शर्मा: दीपावली के बाद आने वाली कार्तिक दशमी को शहर में कंस वधोत्सव का आयोजन होता है। 10 फीट ऊंचा कंस का पुतला सोमवारिया बाजार स्थित कंस चौराहे पर विराजित हो चुका है। जानकारी के अनुसार शहर में इस परंपरा को करीब 268 वर्ष हो जाएंगे। आयोजन समिति तैयारी में जुटी हुई है। इस बार नए डायलॉग भी तैयार किए जा रहे हैं।

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कंस वधोत्सव समिति के अनुसार मथुरा के बाद नगर में इस आयोजन को भव्य तरीके से मनाया जाता है। कंस वध के पूर्व रात 8.30 बजे श्री बालवीर हनुमान मंदिर परिसर से चल समारोह शुरू होता है। विभिन्ना जगहों से होता हुआ रात करीब 11 बजे कंस चौराहे पर पहुुंचता है। वाक्युद्ध के बाद रात 12 बजे श्रीकृष्ण बने कलाकार कंस का वध करते है। इसके बाद गवली समाजजन पुतले को लाठियों से पीटते हुए ले जाते है।

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अत्याचार पर जीत का प्रतीक पर्व

कंस वध की परंपरा अन्याय व अत्याचार पर जीत के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है। बताया जाता है कि गोवर्धननाथ मंदिर के मुखिया स्व. मोतीराम मेहता ने करीब 268 वर्ष पूर्व मथुरा में कंस वधोत्सव कार्यक्रम होते देखा और फिर शाजापुर में वैष्णवजन को अनूठे आयोजन के बारे में बताया। इसके बाद से ही परंपरा की शुरुआत हो गई। करीब 100 वर्ष तक मंदिर में ही आयोजन होता रहा किंतु जगह की कमी के चलते इसे नगर के एक .चौराह पर जिसे अब कंस चौराह नाम दिया जा चुका है पर करने लगे।

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गलियों से निकलती है देव-दानवों की टोलियां

कंस वध से पहले पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे देव और दानवों की टोलियां शहर की गलियों से निकलती है। जहां राक्षस हुंकार भरते है तो वहीं देवों की टोली भी वाक्युद्ध में पीछे नहीं रहती है। आयोजन को देखने के लिए शाजापुर समेत बाहरी जिलों से भी लोग शामिल होते हैं।

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