MP में कब गूंजेगी बब्बर शेरों की दहाड़: जानें सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भी मप्र को गुजरात ने क्यों नहीं दिये शेर!

World Lion Day: स्टेटस सिम्बोल और लॉयन पर्यटन को बांटना नहीं चाहता गुजरात, सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भी परवाह नहीं

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हाइलाइट्स

  • 10 अगस्त को है विश्व शेर दिवस यानी World Lion Day
  • मध्य प्रदेश में 34 सालों से चल रहा शेरों को लाने का प्रयास
  • सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी गुजरात देने को तैयार नहीं

World Lion Day: विशेष जनजाति सहरिया बहुल 29 गांवों से 1545 परिवारों का विस्थापन, सुप्रीम कोर्ट का आदेश और 34 साल का इंतजार भी मध्य प्रदेश को गुजरात से बब्बर शेर (एशियाटिक लायन) नहीं दिला सके।

सवाल ये है कि भारत सरकार और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के साथ साथ गुजरात सरकार के खुद के आश्वासन के बाद भी अब तक मध्य प्रदेश में शेरों की दहाड़ क्यों सुनाई नहीं दी।

आखिर गुजरात सरकार एमपी को क्यों शेर नहीं देना चा​हती। 10 अगस्त World Lion Day पर आज 34 साल से चली आ रही इसी लड़ाई को समझने की कोशिश करेंगे।

अफ्रीका के बाद सिर्फ गुजरात में ही शेर

विश्व में अफ्रीका के बाद सिर्फ गुजरात में ही शेर यानी लॉयन पाए जाते हैं। गुजरात के लिये ये एक तरह का स्टेटस सिम्बोल है। मध्य प्रदेश को शेर नहीं देने के पीछे मुख्य वजहों में से एक ये भी है।

मध्य प्रदेश में गुजरात से शेर लाने की सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाने वाले एक्टिविस्ट अजय दुबे मानते हैं कि गुजरात अपनी इस उपलब्धि और विरासत को किसी के साथ साझा नहीं करना चाहता।

1992 में बनाई थी योजना

भारत में बब्बर शेर सिर्फ गुजरात के गिर नेशनल पार्क में हैं। इस प्रजाति को महामारी से बचाने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1992 में श्योपुर जिले के कूनो पालपुर में 'सिंह परियोजना" मंजूर की।

उस समय हुए अनुबंध के अनुसार पार्क में शेरों के लिए रहवास क्षेत्र विकसित होने के बाद गुजरात सरकार को शेर देने थे पर ऐसा नहीं हुआ।

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शेर को लाने एमपी खर्च कर चुकी है 250 करोड़

मध्य प्रदेश सरकार ने करीब ढाई सौ करोड़ रुपये खर्च कर वर्ष 2003 में पार्क तैयार कर लिया। फिर गुजरात व भारत सरकार से शेर मांगे लेकिन नहीं मिले, तब सूचना का अधिकार (आरटीआई) कार्यकर्ता अजय दुबे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई।

कोर्ट ने अप्रैल 2013 में भारत सरकार को छह माह में गिर से शेर कूनो भेजने के आदेश दिए। जब वर्ष 2014 में भी शेर नहीं पहुंचे तो दुबे ने अवमानना याचिका लगाई। आखिर मार्च 2018 में भारत सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि कूनो में जल्द शेर भेजे जा रहे हैं और अवमानना याचिका समाप्त हो गई।

कूनो में आने थे शेर, बस गए चीते

मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में शेरों को बसाया जाना था। कूनो नेशनल पार्क की बायो डाईवर्सिटी गुजरात के गिर के जंगल की तरह ही है।

मध्य प्रदेश में शेरों को लाने के लिये 80 प्रतिशत तैयारी कर ली गई। इसके लिये विशेष जनजाति सहरिया बहुल 29 गांवों से 1545 परिवारों का विस्थापन किया गया, पर गुजरात ने शेर नहीं दिये।

सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बाद गुजरात पर शेरों को देने का नैतिक दबाव बढ़ रहा था। जानकार बताते हैं कि इससे ध्यान हटाने के लिये यहां चीता लाने के प्रोजेक्ट पर काम शुरु हुआ और अफ्रीका से चीतों को लाकर बसा दिया।

लॉयन पर्यटन को बांटना नहीं चाहती इंडस्ट्री

एक्टिविस्ट अजय दुबे कहते हैं कि विश्वभर में या तो अफ्रीका लॉयन है या एशियाई लॉयन। एशियाई लॉयन सिर्फ गुजरात में है।

ऐसे में लॉयन पर्यटन इंडस्ट्रीज भारत के अंदर ही इसे अन्य राज्यों में बांटना नहीं चाहती। यही कारण है कि वह गुजरात से बाहर लॉयन को जाने ही नहीं देना चा​हती।

वरना कोई कारण नहीं है कि गुजरात से मध्य प्रदेश को शेर न मिले।

एक ही जगह पर शेर होने से ये खतरा

अजय दुबे बताते हैं कि एक ही जगह पर शेर होने महामारी या संक्रमण फैलने से बहुत बड़ा खतरा होता है। अफ्रीका में सिर्फ इसी वजह से कई वन्यप्रणाली विलुप्त ही हो गए हैं।

इसके अलावा इनब्रिडिंग का भी खतरा है। वन्य प्राणियों के लिये बना प्रोटोकॉल इसकी इजाजत नहीं देता। इससे उनकी इम्प्यूनिटी कमजोर होती है।

यदि शेर देश के अलग अलग रहवास में रहेंगे तो ये उनके स्वास्थ के लिये बेहतर होगा। साथ ही किसी एक जंगल में महामारी या संक्रमण फैलने से उनके विलुप्त होने की संभावना भी खत्म होगी।

फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगा शेरों को मामला!

अजय दुबे का कहना है कि विशेष जनजाति सहरिया बहुल 1545 परिवारों के साथ धोखा हुआ है। उनसे 29 गांव शेरों के लिये खाली कराये गए थे।

मध्य प्रदेश सरकार गुजरात से शेर मांगने की हिम्मत ही नहीं कर रही है। हम सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका लगाने की तैयारी कर रहे हैं।

एमपी में शेरों को लाने हम जल्द ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।

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