चुनाव में उंगली पर इस्तेमाल की जाने वाली स्याही आसानी से क्यों नहीं मिटती, जानिए इसका इतिहास

चुनाव में उंगली पर इस्तेमाल की जाने वाली स्याही आसानी से क्यों नहीं मिटती, जानिए इसका इतिहास Why the ink used on the finger in elections does not get erased easily, know its history nkp

चुनाव में उंगली पर इस्तेमाल की जाने वाली स्याही आसानी से क्यों नहीं मिटती, जानिए इसका इतिहास

नई दिल्ली। गुरुवार को यूपी विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान संपन्न हो गया। सोशल मीडिया पर लोग 'मेरा वोट मेरा अधिकार' टैग लाइन के साथ उंगली से स्याही वाली तस्वीरें शेयर कर रहे हैं। यदि आपने भी अपना वोट डाला है, तो आपकी उंगलियों पर एक अमिट नीली स्याही लगाई जाती है।यह निशान बताता है कि किसने वोट दिया और किसने नहीं। कहा जाता है कि यह निशान एक बार लगने के बाद 15 दिनों से पहले नहीं मिट सकता। आखिर ऐसा क्या होता है इस स्याही में और चुनाव में इसके इस्तेमाल का क्या है इतिहास, आइए जानते हैं।

चुनाव आयोग को मिली थी शिकायतें

देश में 1951-52 में जब पहली बार चुनाव हुआ, तब मतदाताओं की अंगुली में स्याही लगाने का कोई नियम नहीं था। ऐसे में चुनाव आयोग को कई जगह से दो बार वोट डालने की शिकायतें मिलीं। इन शिकायतों के बाद चुनाव आयोग ने इसे रोकने के लिए कई विकल्पों पर विचार किया। अंत में आयोग ने एक अमिट स्याही का उपयोग करने का फैसला किया। इस स्याही को बनाने के लिए चुनाव आयोग ने नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी ऑफ इंडिया (NPL) से बात की। NPL को एक ऐसी स्याही बनानी थी जो पानी या किसी रसायन से भी न मीट सके।

1962 के चुनाव में इसका इस्तेमाल किया गया

NPL ने इस स्याही को बनाने के लिए मैसूर पेंट एंड वार्निश कंपनी को ऑर्डर दिया। साल 1962 के चुनाव में पहली बार इस स्याही का इस्तेमाल किया गया और तब से लेकर अब तक यह स्याही ही हर चुनाव में इस्तेमाल की जाती है। मालूम हो कि आज तक इस स्याही को बानाने के तरीके को सार्वजनिक नहीं किया गया है। माना जाता है कि अगर इस गुफ्त फॉर्मूले को सार्वजनिक किया गया तो लोग इसको मिटाने का तरीका खोज लेंगे और इसका उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।

धूप में और पक्की हो जाती है स्याही

जानकार बताते हैं कि इस स्याही में सिल्वर नाइट्रेट मिला होता है, जो धूप के संपर्क में आते ही यह और ज्यादा पक्की हो जाती है। जब यह स्याही नाखून पर लगाई जाती है तो भूरे रंग की होती है। लेकिन लगाने के बाद यह गहरे बैंगनी रंग में बदल जाती है। यह स्याही अलग-अलग रसायनों का इस्तेमाल कर बनाई जाती है। वर्तमान समय में इस स्याही की आपूर्ति 28 देशों में की जाती है। इनमें अफगानिस्तान, तुर्की, दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, नेपाल, घाना, पापुआ न्यू गिनी, बुर्कीना फासो, बुरंडी, कनाडा, टोगो, रिएरा लियोन, मलेशिया और कंबोडिया शामिल है।

दूसरे देशों में अलग तरीके से लगाई जाती है स्याही

भारत में इस स्याही का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। भारत में अंगुली पर एक लकड़ी से यह स्याही लगाई जाती है, वहीं कंबोडिया और मालदीव में अंगुली को ही स्याही में डुबोया जाता है। जबकि अपगानिस्तान में पेन से, तुर्की में नोजल से, बुर्कीना फार्सो और बुरूंडी में ब्रश से यह स्याही लगाई जाती है।

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