सरदार उधम सिंह ने अपना नाम ‘मोहम्मद सिंह आजाद’ क्यों रख लिया था? जानिए यह दिलचस्प कहानी

uddham singh

नई दिल्ली। एमेजॉन प्राइम (Amazon Prime) पर रिलीज हुई फिल्म ‘सरदार उधम’ (Sardar Udham) इन दिनों खूब सुर्खियां बटोर रही है। इस फिल्म को शूजित सरकार के निर्देशन में बनाया गया है। फिल्म में मुख्य किरदार विक्की कौशल ने निभाया है। बतादें कि प्रसिद्ध क्रांतिकारी सरदार उधम सिंह ने लंदन में माइकल ओ डायर की गोली मारकर हत्या कर दी थी। साल 1940 की ये घटना दरअसल जालियांवाला बाग हत्याकांड का बदला था। उस हत्याकांड के वक्त माइकल डायर ब्रिटिश शासनकाल में पंजाब के गवर्नर थे और उन्होंने जालियांवाला बाग में हुई हत्या को सही ठहराया था।

क्यों रखा अपना उपनाम

अब शूजित सरकार ने उधर सिंह की वीरगाथा को सम्मान देते हए इस फिल्म का निर्माण किया है। आप इस फिल्म में उनके वीरता को देख सकते हैं। लेकिन, उन्होंने अपना उपनाम ‘मोहम्मद सिंह आजाद’ क्यों रखा इस बारे में कम ही लोग जानते हैं। अगर आप भारत के अतीत के पन्नों को खंगालेंगे तो पता चलेगा कि उधम सिंह धार्मिक और वर्ग एकजुटता के पक्षधर थे। जब उनपर डायर की हत्या का मुकदमा चल रहा था, तो उन्होंने अपना नाम मोहम्मद सिंह आजाद बताया था। उनकी बाजू पर एक टैटू भी बना था, जो इस बात का प्रतीक था कि भारत में सभी धर्म ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके विरोध में एकजुट थे।

मार्च 1940 में उधम सिंह ने जांच अधीक्षक को एक पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने कहा था कि अधिकारी उनके बताए गए नाम मोहम्मद सिंह आजाद को ही सही मानें। उनके नाम को लेकर जब कुछ लोगों ने आलोचना की, तो उन्होंने अपने आलोचकों को सीधा जवा देते हुए कहा था ‘गो टू हेल’। हालांकि वे ब्रिटिश सरकार को अपने इस उपनाम का इस्तेमाल करने को विवश नहीं कर पाए।

उन्होंने हमेशा अपने उपनाम से ही हस्ताक्षर किए

क्योंकि ब्रिटिश सरकार को भी एहसास था कि उनके इस प्रतीकात्मक नाम का क्या प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन उधम सिंह भी अपनी जगह पर डटे रहे। उन्होंने अपने राजनीतिक और जेल पत्राचार पर हमेशा उपनाम से ही हस्ताक्षर किए थे। इसके अलावा कहा जाता है कि उधम सिंह ने अमृतसर में अपनी छोटी सी दुकान के साइन बोर्ड पर भी ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ नाम लिखा था। उधम सिंह, भगत सिंह की ही तरह नास्तिक थे। वे दोनों गहरे दोस्त थे और 1920 के दशक में एक साथ जेल में भी रहे थे।

उधम सिंह ने एक पत्र में लिखा था, “दस साल हो गए हैं, जब मेरा दोस्त मुझे छोड़कर चला गया था। लेकिन मुझे यकीन है कि अपनी मौत के बाद, मैं उससे जरूर मिलूंगा। वह मेरा इंतज़ार कर रहा है। उस दिन 23 तारीख (जब भगत सिंह को फांसी दी गई) थी और उम्मीद है कि मुझे भी उसी दिन फांसी दी जाएगी।”

इतिहासकार क्या मानते हैं

वहीं इतिहासकार मानते हैं कि उधम सिंह का उपनाम खासकर ‘आजाद’ राजनीतिक विचारधारा पर एक दबाव डालने के लिए था। उन्होंने महसूस कर लिया था कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद से आजादी की लड़ाई में सभी धार्मिक समुदायों की एकता कितनी महत्वपूर्ण है। उनका यह नाम भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक था। जब उनके अवशेष, दशकों बाद अगस्त 1974 में भारत लाए गए, तो उनका अंतिम संस्कार एक हिंदू पंडित, एक मुस्लिम मौलवी और सिख ग्रंथी ने किया था और उनकी राख को इन धर्मों से जुड़े पवित्र स्थलों पर बिखेरा गया था।

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