आज 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, लेकिन आज के दिन को खास बनाने के लिए देश और स्वतन्त्रता सेनानियों ने अंग्रेजी हुकूमत की तमाम यातनाओ को ही नहीं झेला,बल्कि हजारों की संख्या में महान स्वतन्त्रता सेनानी शहीद हुए.
देश की आजादी की लड़ाई से लेकर तिरंगे झंडे की अलख हर एक भारतीय के अंदर जगाने का काम स्वतन्त्रता आंदोलन में अपनी प्रमुख भूमिका निभाने वाली काशी में निर्मित तिरंगा बर्फी का भी विशेष योगदान रहा.
अब आप सोचेंगे की भला एक मिठाई इतना बड़ा काम कैसे कर सकती है,तो आइये जानते है काशी में निर्मित इस विशेष तिरंगे बर्फी की कहानी.
काशी में तिरंगा बर्फी की खोज क्रांतिकारियों की खुफिया बैठकों और गुप्त सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए 1940 में आजादी से पहले के युग के दौरान काशी के स्थानीय मिठाई निर्माता मदन गोपाल गुप्ता द्वारा किया गया था.
इस बर्फी को बनाने में कई अन्य क्रांतिकारियों ने भी उनकी मदद की थी. जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था,तब तिरंगे पर प्रतिबंध था और इसी का विरोध जताने के लिए तिरंगे की बर्फी बनाई गई,जिसका रंग बिल्कुल तिरंगे जैसा था.
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंकने के लिए यह बर्फी मुफ्त में भी बांटी गई थी. आजादी से पहले देश में तिरंगे पर अंग्रेजी हुकूमत की ओर लगाए गए रोक पर काशी में क्रांतिकारियों ने देश प्रेमियों की आजादी की अलख जगाने के लिए तिरंगे झंडे के जैसे मिठाई का ईजाद किया था.
इसे तिरंगा बर्फी का नाम दिया गया था. काशी में निर्मित विशेष तिरंगे बर्फी को अप्रैल 2024 को भौगोलिक संकेत (GI) टैग मिला,जिससे इसे एक विशिष्ट पहचान मिली है.
तिरंगा बर्फी झंडे के जैसे केसरिया, सफेद और हरे रंग की तीन परतें होती हैं. शुरुआती समय यह बर्फी में यह बादाम, काजू और पिस्ता (पंचमेवा) से बनती थी,लेकिन खोया (गाढ़ा दूध) और प्राकृतिक रंगों (केसर, पिस्ता) का भी इस्तेमाल होता है.
इस बर्फी में केसर से ऊपरी परत, काजू से सफेद बीच की परत और पिस्ता से हरी निचली परत बनाई जाती है. जिसकी डिमांड देश प्रेमियों के बीच स्वतन्त्रता और गणतंत्र दिवस के मौके पर बढ़ जाती है.