छत्तीसगढ़ के अनसुने मंदिर, जहां इतिहास आज भी सांस लेता है

छत्तीसगढ़ सिर्फ जंगलों और झरनों के लिए नहीं, बल्कि हजारों साल पुराने रहस्यमयी मंदिरों के लिए भी जाना जाता है। कुछ ऐसे स्थल हैं, जो इतिहास की किताबों से बाहर रह गए, लेकिन आज भी अपनी ऊर्जा और स्थापत्य से चौंकाते हैं।

मामा-भांजा मंदिर, बारसूर (बस्तर)

करीब 1000 साल पुराना यह पत्थर का मंदिर अपने अनोखे निर्माण के लिए जाना जाता है। आसपास कई प्रसिद्ध स्थल होने के बावजूद यह मंदिर आज भी अपेक्षाकृत अनदेखा है। यहां की शिल्पकला प्राचीन कारीगरों की अद्भुत समझ को दर्शाती है।

चंद्रादित्य मंदिर, बारसूर: छत्तीसगढ़ का मिनी खजुराहो

इस मंदिर को “छत्तीसगढ़ का मिनी खजुराहो” कहा जाता है। इसकी दीवारों पर बनी जटिल और साहसिक मूर्तियां खजुराहो की याद दिलाती हैं। यह मंदिर तत्कालीन समाज, कला और दर्शन की गहरी झलक देता है।

नारायण पाल मंदिर, बस्तर

इंद्रावती नदी के किनारे स्थित यह 1000 वर्ष पुराना विष्णु मंदिर परिसर आध्यात्मिक शांति का केंद्र है। प्रकृति और आस्था का ऐसा संगम बहुत कम देखने को मिलता है।

बत्तीस खंभा मंदिर, बारसूर

यह मंदिर अपने 32 स्तंभों के लिए प्रसिद्ध है। प्राचीन स्थापत्य कला का यह उदाहरण बताता है कि उस दौर में संरचनात्मक विज्ञान कितना उन्नत था।

देवरानी-जेठानी मंदिर, तालागांव

5वीं–6वीं सदी के ये मंदिर अपनी अलग तरह की मूर्तियों और वास्तुकला के लिए जाने जाते हैं। यहां की प्रतिमाएं भारत के अन्य मंदिरों से बिल्कुल अलग पहचान रखती हैं।

गमावाड़ा के पत्थर स्तंभ, दंतेवाड़ा: भारत का स्टोनहेंज

करीब 3000 साल पुराने ये पत्थर स्तंभ मंदिर नहीं हैं, लेकिन इन्हें भारत का स्टोनहेंज कहा जाता है। इनका संबंध प्राचीन आदिवासी आध्यात्मिक परंपराओं से माना जाता है।

घने जंगल, पहाड़ों की गोद और नदियों के किनारे बसे छत्तीसगढ़ में ऐसे कई मंदिर हैं, जो हजारों साल पुराने इतिहास और रहस्य को अपने भीतर समेटे हुए हैं। ये स्थल न तो पर्यटन के बड़े नक्शों पर उभरे हैं, जहां आस्था, कला और प्रकृति एक साथ सांस लेते हैं।